अध्याय 1-परमेश्वर कौन है ?

अध्याय:1

परमेश्वर कौन है

1.सभी वस्तुओं का सृष्टीकर्ता

उत्पति 1:1 पद कहता है “ आदि मे परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की रचना की। परमेश्वर सृष्टीकर्ता है। जिसने हर एक वस्तु की सृष्टी की है। शब्द “रचना“ का अर्थ है कुछ नही से कुछ की रचना करना। इब्रानियों 11:3 पद कहता है- विश्वास ही से हम जान जाते है कि सारी सृष्टी की रचना परमेश्वर के वचन के द्वारा हुई है पर यह नही कि जो कुछ देखने मे आता है, वह देखी हुई वस्तुओं से बना हो। यह कार्य परमेश्वर के वचन द्वारा हुआ जिसने सभी वस्तुओं की रचना कुछ नही से की है।

सृष्टी का संचालन और जो कुछ सृष्टी मे है उसको देखने के द्वाराऔर प्रकृति के अद्भुत सिद्धान्तो के द्वारा परमेश्वर लोगों को यह विश्वास दिलाता है कि परमेश्वर ही सृष्टीकर्ता है।

रोमियों 1:20 पद कहता है -उसके अंदेखे गुण अर्थात उसकी सनातन सामथ्र्य और परमेश्वरत्व जगत की सृष्टी के समय से उसके कामो के द्वारा देखने मे आते है यहां तक कि वे निरूत्तर है। इसका अर्थ यह है कि जब मनुष्य न्याय के सिहासनं के सामने खड़े होगें तो उनके पास कोई भी बहाना नही होगा कि उनको परमेश्वर को जानने का मौका नही मिला।

बाइबल की शिक्षाओं के अतिरिक्त यहां तक कि अगर हम बस अपनी समझ के अनुसार सोचें तो हम पाऐगें कि निश्चित तौर पर परमेश्वर है और वह ही हर वस्तु का सृजनहार है। अगर बंदर विकसित होकर मनुष्य बने होते तो आज भी चिङियाघर मे इतने बंदर है वो अब तक मनुष्य मे क्यों विकसित नही हुए। क्यों अब तक उनकी वही बनावट है जो हजारों वर्ष पूर्व थी। जैसा कि बाइबल मे लिखा है केवल मनुष्य के पास ही विवेक और आत्मा है क्योंकि मनुष्य ही परमेश्वर के स्वरूप मे बना है और इसलिए इसके अलावा यहां तक कि वे विभिन महाद्विपों मे रहते है सभी मनुष्य की दो आखें एक नाक ओर एक मुह है और सभी अंगों का अपना अपना एक निश्चित स्थान है।विभिन्न जातियों के होने के बावजूद भी यह तथ्य कि सभी मनुष्यों कि आकृति एक जैसी है हमे बताता है कि यदि हम वषांवली मे पीछे की ओर जाएं तो हम एक ही पूर्वज पर पहुंचेगे। अतः हम यह देख सकते है कि बाइबल के अनुसार परमेश्वर ने मनुष्य की रचना अपने ही स्वरूप मे की यह ज्यादा वैज्ञानिक है।

यदि हम मनुष्य और पृथ्वी पर पशु , हवा मे पक्षी, समुद्र मे मच्छली और सभी जीवो को जाॅचें तो हम पाएगें की सभी के अंगों की एक निश्चित स्थिति है। एक नाक, दो आखें, और एक मुह, जो कि नाक के नीचे है और चेहरे के दोनो ओर कान है । केवल इसी तथ्य की ओर ध्यान देकर हम इस बात का इन्कार नही कर सकते है कि सृष्टीकर्ता एक ही है।

इसके अतिरिक्त चाहे विज्ञान और सभ्यता कितनी भी विकसित क्यों न हो गई हों, मानव स्वंय जीवन नही बना सकता है। कुछ की रचना कुछ नही से करना यह वह विशेष कार्य है जो केवल परमेश्वर से संबधित है। विज्ञान के द्वारा मनुष्य सिर्फ परमेश्वर द्वारा बनाई गई चीजों का उपयोग करके दूसरी चीजों की खोज कर सकता है। दूसरी चीजों को विकसित कर सकता है और दूसरी चीजें बना सकता है । ऊपर  दिये गयें तर्को की ओर ध्यान दे कर यदि सिर्फ हम अपने हृदय को खोल दे और  संसार की ओर देखे हम शीघ्र ही महसूस करेगें के स्वर्ग और पृथ्वी और सभी वस्तुएं परमेश्वर के द्वारा रची गई है। और यह अनुभव करेगे कि परमेश्वर ही सृष्टीकर्ता है । हम यह विश्वास करने मे समर्थ होगें कि परमेश्वर ही है जो जीवन और मृत्यु को नियंत्रित करता है। और पूरी मानवजाति का भाग्य और दुर्भाग्य और मनुष्य का इतिहास भी परमेश्वर ही नियंत्रित करता है।

2.वह स्वयं ही मौजूद था “मै जो हूँ सो हूँ ।

एक बार यदि मनुष्य परमेश्वर मे रूचि लेने लगें तो उसे आश्चर्य होगा कि वह कहां से आया है। और वह किस तरह का है। मनुष्य के ज्ञान और समझ के साथ हम यह विचार करेगें कि एक चीज कि शुरूआत और अन्त के विषय मे जानने की इच्छा प्रकट करेगें। परंतु परमेश्वर के अस्तित्व मे न तो शुरूआत है और न ही अन्त है। उसका अस्तित्व उस विस्तार से परे है जिसे हम समझ नही सकते है। वह अनन्त से भी पहले से मौजूद था और उसका अस्तित्व हमेशा बना रहेगा। वह न तो किसी से उत्पन्न हुआ है और न किसी के द्वारा रचा गया है। वह स्वयं ही सृष्टीकर्ता के रूप में मौजूद था।

निर्गमन 3:13-14 मे लिखा है मूसा ने परमेश्वर से कहा, जब मै इस्राइलियों के पास जाकर उनसे कहॅू तुम्हारे पितरों के परमेश्वर ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है तब यदि वे मुझ से पूछें उसका क्या नाम है तब मै उनको क्या बताऊँ? परमेश्वर ने मूसा से कहा “मै जो हूँ सो हूँ“

पमरेश्वर मै जो हूँ सो हूँ ही नही है बल्कि वह अल्फा ओमेगा और पहला और अतिंम, शरूआत और अन्त भी है। (प्रकाशित वाक्य 22:13)।

अल्फा और ओमेगा युनानी भाषा का पहला और अन्तिम शब्द है। मनुष्य ने अक्षरों की खोज की और इनके अक्षर मनुष्यों ने ज्ञान पर ज्ञान एकत्रित किया और विज्ञान और विभिन्न सभ्यताएॅ विकसित की । यहां तक कि यह ज्ञान परमेश्वर के द्वारा दिया गया है। और विज्ञान को भी परमेश्वर ने विकसित किया है। इसलिए परमेश्वर ही विज्ञानिक सभ्यता कि शुरूआत और अन्त है। और परमेश्वर ही अल्फा और ओमेगा है। और यह भी परमेश्वर ने आदम को पहला और उद्वार का प्रावधान यीशु के द्वारा पूरा किया है। 1 कुरन्थियों 15ः45 पद कहता है इसलिए परमेश्वर ही पहला और अतिंम है उसी ने ही मानव इतिहास की शुरूआत की और अन्त तक नियंत्रित किया। और इसलिए पमरेश्वर ही पहला और अन्तिम है।

3.सर्वशक्तिमानऔर सर्वव्यापी।

परमेश्वर ही सृष्टीकर्ता है। वह सवयं ही मौजूद था और वह सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी है वह सब जानता है अतः कुछ भी ऐसा नही जो वह नही जानता हो। वह कुछ भी करने मे सामर्थी है।कुछ भी ऐसा नही है जो वह नही कर सकता । परमेश्वर ने कहा मै सर्वशक्तिमान परमेश्वर हूँ। (उत्पति17ः11)। और यहां तक कि विश्वास के पिताओं ने भी कहा है परमेश्वर सर्वशक्तिमान है (उत्पति 28:13)

सर्वशक्तिमान परमेश्वर जो कि जीवित है स्वयं को ऐसे चिन्ह और चमत्कार दिखा कर प्रमाणित करता है जो मनुष्य की सामर्थ और योग्यता द्वारा सम्भव नही है।

जब परमेश्वर इस्राईल के लोगों को मिस्त्र से मूसा के द्वारा निकाल लाया तब तक परमेश्वर ने बहुत से चमत्कार इस्राइल के लोगों को दिखाए ताकि वे विश्वास करे कि मूसा परमेश्वर के द्वारा चुना हुआ हैं। (निर्गमन 4:30-31)। और बहुत से चिन्ह दिखाए और दस विपत्तियां मिस्त्र पर डाली ताकि फिरोन इस्राइल के लोगों को जाने दें (निर्गमन 7:1-12, 36)

और मिस्त्र से निकल जाने पर भी जब इस्राइली जगंल मे थे , परमेश्वर ने आग के खम्बे और धुंए के बादल के द्वारा अगुवाई की । लाल समुद्र को दो भाग किया, खारे पानी को मीठे पानी मे बदल दिया। उनको मन्ना दिया और बटेंरे दी और चटृान मे से पानी दिया।(निर्गमन 13:21, 17:6)।

मूसा की मृत्यु के पश्चात जब पमरेश्वर कनान की ओर इस्राइल की अगुआई यहोशू के द्वारा कर रहा था तक परमेश्वर ने यरदन की नदी के बहाव को रोक दिया । और सूर्य तथा चद्रमा को स्थिर कर दिया। (यहोशु 4:1.6, 10:12-14) । इन चिन्हो और चमत्कारों के द्वारा परमेश्वर ने उन्हे कनान के राज्य को जीतने मे अगुवाई की।

परमेश्वर का एक अदभुत चमत्कार यह है कि वह मौसम को नियत्रित कर सकता है वह बारिश कर सकता है और बारिश रोक भी सकता है। यह एक ऐसा चिन्ह है जो मनुष्य की सामर्थ और योग्यता से परे हैं। कुछ उदारण और है जैसे मृत लोगों को पुनः जीवित करना। बिमारियों को चगां करना जिसको दवाइयों और विज्ञान से नही किया जा सकता है। यीशु जो परमेश्वर के पुत्र के रूप मे धरती पर आया उसने बहुत से चिन्ह और चमत्कार दिखाएं। उसने बहुत से लोगों को चगां किया अैार आंधी और तूफान को थमा दिया। यह उसने इसलिए किया जैसा की युहन्ना 4:48 मे कहा गया है कि लोग जब तक चिन्ह और चमत्कार न देख ले ये विश्वास नही करेगें।

सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी परमेश्वर आज भी विभिन्न चिन्हो और चमत्कारों के द्वारा अपने होने का प्रमाण दे रहा है । इसके द्वारा बहुत से लोग परमेश्वर पर विश्वास ला रहें है और उद्धार को प्राप्त कर रहें है।

4.बाइबल का लेखक।

जीवित परमेश्वर ने जो कुछ ब्रहांड और जो कुछ इसमे है सब की रचना एक विशेष योंजना और एक विशेष मकसद के लिए की है। परमेश्वर ने मनुष्य की रचना की और उसे आशिष दी और उसे अपनी संतान होने का अधिकार दिया। और सभी वस्तुओं का स्वामी ठहराया। परन्तु पाप के कारण मनुष्य की आत्मा मर गई। परमेश्वर के साथ मनुष्य का सम्पर्क टूट गया। और अब न वह परमेश्वर को देख सकता है और न ही समझ सकता है।  मनुष्य ऐसी दयनीय स्थिति मे आ गया जहां वह परमेश्वर को न तो देख सकता है और न ही मिल सकता है। जब तक कि परमेश्वर स्वयं अपने आप को उस पर प्रकट न करें और अपने आप को समझने की सामर्थ मनुष्य को न दें। प्रेमी परमेश्वर अपने आप को विभिन्न माध्यमो से प्रकट करता है ताकि मनुष्य परमेश्वर को समझ सकें। और बाइबल एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा हम परमेश्वर को समझ सकते है। यह वह पवित्र बाइबल है जिसमें परमेश्वर के पवित्र वचन लिखे है।

यशायह 34:16 पद कहता है यहोवा की पुस्तक से ढुंढकर पढ़ो इनमे से एक भी बात बिना पूरे हुए नही रहेगी। कोई बिना जोड़ा न रहेंगा क्योंकि मैने अपने मुह से यह आज्ञा दी है। और उसी की आत्मा ने उन्हे इक्टठा किया है।

बाइबल में 39 पुस्तके पुराने नियम की है और 27 पुस्तकें नयें नियम की है। यह पूर्ण पुस्तक है। जिसमे परमेष्वर के कार्याे को लेखको ने 1600  वर्षाें में 1500 बी सी से 100 ए डी तक लिखा गया है। बाइबल कुछ दर्जनो लोगों के द्वारा कई वर्षाें तक लिखी गई है। परन्तु पूरी बाइबल मे पूर्णता और सामजस्य है। जैसे कि वह एक ही लेखक द्वारा लिखि गई है। यह एक माला है जो बहुत से मोतियों से मिलकर बनी है। यह तथ्य इस बात को प्रमाणित करता है। कि बाइबल परमेश्वर के प्राकशन द्वारा उसकी इच्छा के अनुसार लिखी गई है। (2 पतरस 1:21) यह मनुष्य की इच्छा के अनुसार नही परन्तु परमेश्वर की प्रेरणा से लिखी गई है। ( 2 तिमाथियों 3:16)  हम यह समझ सकते है कि परमेश्वर ही बाइबल का लेखक है।

तो फिर परमेश्वर ने लोगों को यह पुस्तक क्यों लिखने दी। यूहन्ना 20:31 पद कहता है परंतु ये इसलिए लिखें गऐं है कि तुम विश्वास करो कि यीशु ही परमेश्वर का पुत्र मसीह है। और विश्वास करके उसके  नाम से जीवन पाओ। 2 तीमुथियुस 3:15 कहता है और बालकपन से पवित्र शास्त्र तेरा जाना हुआ है, जो तुझे मसीह पर विश्वास करने से उद्धार प्राप्त करने के लिये बुद्धिमान बना सकता है। जैसा कि कहा गया है कि यह हमारे लिए है कि हम यीशु पर विश्वास करें कि वह हमारा उद्धारकर्ता है और जीवन और उद्धार प्राप्त करें।

(यूहन्ना 1:1) इसलिए हमे यह जानना चाहिए कि बाइबल परमेश्वर का वचन है और वचन ही परमेश्वर है। और जब बाइबल पर मनन करतें है तो हमें इससे पढ़ना सुनना और देखना चाहिए कि कैसे हम परमेश्वर से मिल रहें है और अन्नत जीवन प्राप्त करना है (यूहन्ना 5:39)।

 

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