मनुष्य के पुत्र का मांस खाए और लहू पिऐ बिना अनन्त जीवन नहीं (1)

मनुष्य के पुत्र का मांस खाए और लहू पिऐ बिना अनन्त जीवन नहीं  (1)

‘‘यीशु ने उनसे कहा, ‘मैं तुमसे सच सच कहता हूं कि जब तक तुम मनुष्य के पुत्र का मांस न खाओ और उसका लहू न पियो तो तुम में जीवन नहीं ……क्योंकि मेरा मांस वास्तव में खाने की वस्तु है, और मेरा लहू वास्तव में पीने की वस्तु है।’’ (यूहन्ना 6:53-55)

जब कोर्इ व्यक्ति यीशु को ग्रहण करता है और अपने पापों से पश्चाताप करता है, वह पुन: जन्म लेता है और जैसे परमेश्वर उसे पवित्र आत्मा प्रदान करेगा, वह अनंत जीवन पायेगा। प्रभु को ग्रहण करने के पश्चात नया जन्म प्राप्त करना यद्यपि यह नहीं दर्शाता कि उसने अनंत जीवन प्राप्त कर लिया है; उसे चाहिये कि आत्मिक भोजन ग्रहण करते रहने से बढ़ता रहे ताकि मसीह की भरपूरी तक पहुंचने के परिमाण तक पहुंच जाये।

‘‘आत्मिक भोजन’’ जो आत्मिक बढ़ोत्तरी के लिये वाँछनीय है, ‘‘मनुष्य के पुत्र का मांस’’ तथा ‘‘उसके लहू’’ को दर्शाता है। केवल तभी जब हम मनुष्य के पुत्र का मांस खाते हैं तथा उसका लहू पीते हैं, हम अनंत जीवन प्राप्त कर सकते हैं (यूहन्ना 6:53-55)।

आइये आज हम मनुष्य के पुत्र का मांस खाने तथा लहू पीने की गहरार्इ को देखें।

1-’’मनुष्य के पुत्र का मांस खाने और लहू पीने’’ का अभिप्राय

मनुष्य के पुत्र का मांस यीशु का मांस है, वह बाइबल में दर्ज ‘‘परमेश्वर का वचन’’ है। जैसा यूहन्ना 1:14 हमें बताता है, ‘‘और वचन देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्चार्इ से परिपूर्ण होकर हमारे बीच डेरा किया और हमने उसकी ऐसी महिमा देखी जैसी पिता के एकलौते की महिमा।’’

यीशु ने स्वयं के लिए बताया, ‘‘जीवन की रोटी जो स्वर्ग से उतरी, मैं हूँ। यदि कोर्इ इस रोटी में से खाए, तो सर्वदा जीवित रहेगा; और जो रोटी मैं जगत के जीवन के लिये दूंगा, वह मेरा मांस है।’’

मनुष्य के पुत्र का मांस खाना……… परमेश्वर का वचन, जीवन की रोटी….. स्पष्ट रूप से यीशु के ‘‘मेम्ना’’ होने से बहुत निकट का सम्बंध रखता है। यूहन्ना 1:29 में यूहन्ना बपतिस्मा दाता यीशु को ‘‘परमेश्वर का मेम्ना है जो जगत के पाप उठा ले जाता है’’ कहकर दर्शाया है। आम तौर से कहें तो, मेम्ना केवल अपने चरवाहे का कहा मानता है और सीधा होता है, तथा मनुष्य को लाभ पहुंचाता है। इसी प्रकार, यीशु केवल पिता की इच्छा का आज्ञाकारी था, और यूँ, वह एक सीधे मेम्ने की भाँति एक शुद्ध करने वाला बलिदान बना, और उसने मानव-जाति को केवल अच्छी वस्तुएं ही दीं। मेम्ने में, जो एक वर्ष की आयु से कम है, वही विशेष कर पवित्र होते हैं क्योंकि वे मैथुन रहित होते हैं, और आत्मिक रूप में वे हमारे यीशु की भाँति बेदाग और निर्दोष हैं।

जब मिस्र में हर पहिलैठों की मृत्यु हो चुकने के बाद जैसा कि निर्गमन अध्याय 12 में चित्रित है, परमेश्वर ने इस्राएलियों को निर्देश दिया किया वे एक मेम्ना ‘‘एक वर्ष का नर निर्दोष मेम्ना’’ अपने लिये लें और ‘‘तब उसके लहू में से कुछ लेकर जिन घरों में मेम्ने को खायेंगे उनके द्वार के दोनों अलंगों और चौखट के सिरे पर लगायें।’’ परमेश्वर ने इस्राएल के लागों को कि, वे कैसे मेम्ने को खायेंगे, इसके लिए विस्तार से निर्देश दिये थे (निर्गमन 12:8-10) क्योंकि इसमें हमारे जीवन के लिए सीधे रूप से एक आत्मिक पाठ सम्बद्ध है।

‘‘और वे उसके मांस को उसी रात आग में भूंजकर अखमीरी रोटी और कड़वे सागपात के साथ खाएं। उसको सिर, पैर, और अंतड़ियों समेत आग में भूंजकर खाना, कच्चा या जल में कुछ भी सबेरे तक न रहने देना, और यदि कुछ सबेरे तक रह भी जाए, तो उसे आग में जला देना।’’ (निर्गमन 12:8-10)

2- मेम्ने को खाना

1) ‘‘कच्चा या जल में उबाल कर न खाना,’’ किन्तु आग में भून कर खाना।

यहां ‘‘आग’’ पवित्र आत्मा की आग की प्रतिनिधित्व करती है, और हमारे पवित्र आत्मा की प्रेरणा द्वारा इसको समझना तथा परमेश्वर के वचन को रोटी बनाना है। पवित्र आत्मा की आग को प्रज्ज्वलित करने के लिए उत्साही प्रार्थना अनिवार्य है।

2) पतरस 1:20-21 हमको याद दिलाता है, ‘‘उसका ज्ञान तो जगत की उत्पत्ति के पहले ही से जाना गया था, पर अब इस अन्तिम युग में तुम्हारे लिये प्रगट हुआ। उसके द्वारा तुम उस परमेश्वर पर विश्वास करते हो, जिसने उसे मरे हुओं में से जिलाया और महिमा दी कि तुम्हारा विश्वास और आशा परमेश्वर पर हो।’’

2-पतरस 3:16 हमें चेतावनी देता है कि पवित्र आत्मा की प्रेरणा के बिना परमेश्वर के वचन को तोड़ मरोड़कर प्रदर्शित करना हमें सत्य से दूर ले जाता है और हमें नाश की ओर ले जाता है। पवित्र आत्मा के बिना परमेश्वर के वचन को ‘‘तोड़ना-मरोड़ना’’ बिल्कुल ऐसा है जैसे मेम्ने को ‘‘कच्चा और पानी में उबाल कर खाना।’’

‘‘परमेश्वर के वचन को कच्चा खाना’’ से क्या तात्पर्य है?’’ यहां भीतर छुपे आत्मिक अभिप्राय को समझे बिना शब्दों के अनुसार परमेश्वर के वचन की व्याख्या करना है। कच्चा भोजन अपचन और पेट दर्द पैदा कर सकता है। इसी प्रकार, ‘‘परमेश्वर के वचन को कच्चा खाना’’ हमें अविवेक तथा बार्इबल की झूठी व्याख्या की ओर ले जा सकता है।

उदाहरार्थ, यीशु हमको मत्ती 6:6 में बताता है, ‘‘परन्तु जब तू प्रार्थना करे, तो अपनी कोठरी में जा; और द्वार बन्द कर के अपने पिता से जो गुप्त में है प्रार्थना कर। तब तेरा पिता जो गुप्त में देखता है, तुझे प्रतिफल देगा।’’ शब्दों के अनुसार तो इस पद का आशय बताता है कि हमे एक अन्दरूनी कमरा निर्मित करवाना चाहिए जिसमें हम प्रार्थना करें। तो भी, हम बाइबल में कहीं भी नहीं पाते कि कोर्इ भी विश्वास का पिता एक ‘‘अन्दरूनी कमरे’’ में प्रार्थना कर रहा है। इसी प्रकार यीशु ने भी बजाय किसी वाटिका अथवा दूर के स्थान के अन्दरूनी कमरे में प्रार्थना नहीं की।

आत्मिक रूप से, ‘‘कमरा’’ आदमी के हृदय को दर्शाता है। यदि आप अन्दरूनी कमरे में गये और द्वार बंद कर लिया तो आप शेष जगत से कट जायेंगे। यीशु की आज्ञा, ‘‘अपने अन्दरूनी कमरे में जा,’’ हमें याद दिलाती है कि जब हम प्रार्थना करें, हम ‘‘दिखावे’’ के लिए न करें अथवा सांसारिक आवश्यकताओं तथा कायोर्ं में फंसकर वही चीजें बार-बार न दोहराते रहें; हमारा परमेश्वर के साथ वार्त्तालाप हृदय की गहरार्इ से होना अनिवार्य है।

बाइबल जब हमें बताती है कि मेम्ने को ‘‘पानी में उबाल कर नहीं खाना है’’ तो उसका अर्थ क्या है? यह बताती है की इस संसार की वस्तुएं परमेश्वर के वचन के साथ नहीं मिलानी चाहिए। परमेश्वर के वचन के प्रचार में, ऐसे लोग हैं, जो अपने संदेशों में सांसारिक बातें जैसे राजनीति तथा प्रचलित चीजों को मिश्रित कर लेते हैं अथवा दार्शनिक के बोल और अन्य सांसारिक ज्ञान को मिलाकर उनको सत्य की भाँति प्रस्तुत करते हैं। जबकि, मनुष्य के विचार तथा ज्ञान सीमित हैं और संसार का कोर्इ भी ज्ञान सिद्ध नहीं है। 1-कुरून्थियों 1:25 हमें झंझोड़ता है और याद दिलाता है, ‘‘परमेश्वर की मूर्खता मनुष्यों ज्ञान से ज्ञानवान है, और परमेश्वर की निर्बलता मनुष्यों के बल से बहुत बलवान है।’’

परमेश्वर का वचन संसार के प्रत्येक ज्ञान से बढ़कर है और यही अन्तिम तथा अपरिवर्तनीय सत्य है। इसको ध्यान में रखते हुए ही किसी को सांसारिक ज्ञान और सिद्धान्त को परे रखते हुए पवित्र आत्मा से प्रेरित बाइबल में पाये जाने वाले परमेश्वर के वचन की व्याख्या करनी चाहिए। उसे चाहिए कि वह विश्वासी भार्इ-बहनों को जीवते सच्चे परमेश्वर की शिक्षा दे: उन मागों की जिनपर चलकर वे परमेश्वर से भेंट कर सकते हैं, और अपने प्रति परमेश्वर की इच्छा को जान सकते हैं, और ज्ञान पा सकते हैं कि मसीह में उद्धार हेतु उचित जीवन का प्रतिरूप क्या है। इसी कारण निर्गमन हमे बताता है ‘‘पानी में उबला हुआ’’ मेम्ना न खायें।

2) ‘‘उसको सिर, पैर, और अंतड़ियों सहित’’ पूरा खाना है

इसका अर्थ है कि हमें बाइबल में पाये जाने वाले समस्त परमेश्वर के वचन को रोटी बना लेना है: उत्पत्ति से प्रकाशित वाक्य तक। बार्इबल को पढ़ते समय कुछ लोग ऐसे कठिन भागों को जैसे लेव्यव्यवस्था को अलग कर देते हैं, वहीं दूसरे लोग बाइबल में दर्शाये चिन्हों और अदभुत कार्यों को नकार देते हैं या असंतुष्ट रहते हैं।

यदि लोग उन बाइबल के भागों को काट डालेंगे जो उनके विचार तथा सिद्धान्तों के अनुसार नहीं हैं, तो शेष भी उनके लिये ना तो सत्य हैं और न विश्वास योग्य, बस उनकी नीति तथा सिद्धान्त शेष रह जायेंगे। उनसे ऊपर, यदि वे यहां तक कि परमेश्वर की आज्ञाओं को अपने हृदय में स्थान नहीं देते जो कि उनके लिये कठिन है, वे कभी भी अनंत जीवन प्राप्त नहीं कर सकते, कोर्इ बात नहीं चाहे उन्होंने कितनी ही बार अथवा बार-बार बाइबल पढ़ी हो। परमेश्वर का वचन भागों और टुकड़ों में नहीं लेना है बल्कि सारे के सारे को रोटी बनाना है। इसी कारण से परमेश्वर ने इस्राएलियों को आज्ञा दी कि मेम्ने को ‘‘सिर, पैर और अंतड़ियों सहित’’ खायें।

3) और उसमें से कुछ भी सवेरे तक न रहने देना और यदि कुछ सवेरे तक रह भी जाये तो उसे आग में जला देना।

यदि इस्राएली भोर तक मेम्ने को खाकर समाप्त न कर लेते तो उन्हें शेष को आग में जला देना होता था। आत्मिक रूप से, ‘‘रात’’ समय के उस अंतराल को दर्शाती है, जिसमें शत्रु शैतान इस संसार पर राज्य करता है। अन्तिम दिनों में, जब संसार पूरी तरह से पापों तथा बुरार्इ में डूबा होगा, उस समय केवल अंधकार बढ़ेगा। परमेश्वर के चुने हुए दिन जब हमारा प्रभु हमारे पास लौट कर आयेगा, अंधकार हटा दिया जायेगा। और ज्योति सेवेरे को लेकर आयेगी।

उस समय लोग अनुभव करेंगे कि हर चीज़ जो बाइबल में प्रभु यीशु के आगमन, स्वर्ग में उठाये जाने तथा अन्य सभी सत्य थीं। और प्रमाण होगा कि किस सीमा तक विश्वासियों ने शुद्धता को प्राप्त किया और स्वर्ग में पुरस्कार सुरक्षित किया। लोग तब महसूस करेंगे कि उनकी स्वयं की धार्मिकता तथा आत्म-सम्मान कितना मूर्खता पूर्ण था, और संसार के प्रति उनका प्रेम और संसार के मार्ग कितने बुरे थे।

हालांकि जो कुछ वे पहले कर चुके हैं, उसके लिये करने को अब कुछ भी शेष नहीं। कोर्इ बात नहीं चाहे वे अपने लिये चाहे कितने ही दु:खी क्यों न हों। अत: इससे पहले कि सवेरा हो- हमारे प्रभु के लौटने से पहले- हम अनिवार्यत: परमेश्वर के सम्पूर्ण वचन को अपनी रोटी बना लें- उसकी दुल्हन के रूप में अपनी समस्त तैयारियाँ पूरी कर लें- और उसके आगमन की प्रतीक्षा करें।

मसीह में प्रिय भाइयों और बहिनों, जिस सीमा तक हमने परमेश्वर के वचन को अपनी रोटी बनाया है, वही इस संसार में और स्वर्ग में हमारे जीवन की विशिष्टता तय करेगा।

अत: आप में से हर एक परमेश्वर के वचन के हर भाग (टुकड़े) को अपनी रोटी बनाये और स्वर्गीयराज्य के शानदार स्थान में प्रवेश करें, यीशु मसीह के नाम में मैं प्रार्थना करता हूं। आमीन

1 Comment

  1. wow..that is wonderful, I never heard such explanation before..Thank you Father God for your such great servant who brings down the will of God….

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