‘‘क्रूस का संदेश-1’’

‘‘क्रूस का संदेश’’ परमेश्वर की वह गुप्त बुद्धि है जो समय (युग) के आरम्भ होने से पहले से छिपी हुर्इ है। ‘‘क्रूस का संदेश’’ श्रृंखला में मानवजाति के उद्धार के लिए परमेश्वर की योजना का वर्णन है। वे लोग जिन्होंने पहले कभी परमेश्वर को नहीं जाना, वे उससे भेंट कर पाएंगे और उसका अनुभव और नया जीवन प्राप्त करेंगे। परमेश्वर कौन है इसकी सही सही समझ होना, हमारे मसीह जीवनों में बहुत ही बुनियादी और महत्वपूर्ण बात है। मनमिन समाचार के अगले चार संस्करणों में मैं इसी विषय पर चर्चा करते हुए, संदेशों को प्रकाशित करूंगा।

सृष्टिकर्ता परमेश्वर

‘‘आदि में परमेश्वर ने स्वर्ग और पृथ्वी की सृष्टी की’’ (उत्पत्ति 1:1)

प्रकाशन का क्रम

परमेश्वर कौन है?

  1. वह सृष्टिकर्ता परमेश्वर है।
  2. वह ‘‘मै जो हूँ सो हूँ’’ है।
  3. वह सर्वशक्तिमान है।
  4. वह बार्इबल का लेखक है।

जबकि कुछ लोग इस संसार में दावा करते हैं कि कोर्इ परमेश्वर है ही नहीं। यद्यपि वह हमारी इन नग्न आँखों से दिखार्इ नहीं पड़ता तब भी वह वास्तव में मौजूद है। केवल एक ही परमेश्वर है जिसकी हमें सेवा और आराधना करनी है वह स्वयं परमेश्वर है।

सृष्टि की प्रत्येक वस्तु का सृष्टिकर्ता जिसमें मानवजाति भी शामिल है वही है और सब देखी और अनदेखी वस्तुओं पर शासन और न्याय करने वाला भी वही है।

और अधिक सही सही शब्दों में मनुष्य के लिए ये समझना कि परमेश्वर कौन है, ये कोर्इ आसान काम नहीं है क्योंकि मनुष्य तो केवल एक प्राणी है जबकि परमेश्वर मनुष्य की सीमित सोच से कहीं बढ़कर है चाहे मनुष्य कितनी भी सावधानी से जाँच करले तब भी वह अपने सीमित ज्ञान में परमेश्वर को पूरी तरह से समझ नहीं सकता।

हम परमेश्वर के बारे में सब कुछ नहीं जान सकते फिर भी परमेश्वर की संतान को परमेश्वर की सब से बुनियादी विशेषताओं से अवश्य अवगत रहना चाहिए।

सबसे पहले मैं यह प्रमाणित करूँगा की ‘‘परमेश्वर सृष्टिकर्ता है’’।

  1. परमेश्वर जो सृष्टिकर्ता है।

उत्पत्ति 1:1 हमें बताता है कि आदि में परमेश्वर ने स्वर्गों और पृथ्वी की सृष्टि की और जब कुछ भी मौजूद नहीं था, शुन्य की दशा से उसने प्रत्येक वस्तु की रचना की। परमेश्वर ने छ: दिनों में अपने वचन द्वारा स्वर्गों ओर पृथ्वी की सृष्टि की। और सृष्टि की रचना करने के छठवें और अन्तिम दिन उसने मानवजाति के पिता आदम को बनाया।

क्योंकि मनुष्य, परमेश्वर द्वारा बनाया गया है, इसीलिए मनुष्य स्वभाविक रूप से अपने दिल की गहरार्इ में इस बात का अहसास करता और मानता है कि किसी आलौकिक प्राणी का अस्तित्व है। सभोपदेशक 3:11 में  हम पाते  हैं कि ‘‘उसने प्रत्येक वस्तु को अपने समय के लिए उपयुक्त बनाया है। उसने उनके मनों में अनन्तता का ज्ञान भी उत्पन्न किया है, फिर भी वे उन  कामों को समझ नहीं सकते जो परमेश्वर ने आदि से अन्त तक किए हैं’’ अनन्तता का ज्ञान उनके मनों में डाले जाने के कारण वे लोग शुद्ध विवेक के साथ किसी प्रकार की र्इश्वरीयता को स्वीकार करते और खोजते हैं।

रोमियों 1:20 में लिखा है ‘‘क्योंकि जगत की सृष्टि से ही परमेश्वर के अदृश्य गुण, अनन्त सामथ्र्य और परमेश्वरत्व उसकी रचना के द्वारा समझे जाकर स्पष्ट दिखार्इ देते हैं, इसलिए उनके पास कोर्इ बहाना नहीं। इस पद से हमें ऐसा लगता है कि चाहे यदि हमने परमेश्वर को आमने सामने व्यक्तिगत रूप से न भी देखा हो तब भी हम ये जान सकते हैं कि परमेश्वर जीवित है और वह ही केवल एक सृष्टिकर्ता है।

  1. प्रमाण, जिसके द्वारा हम सृष्टिकर्ता परमेश्वर में विश्वास कर सकते हैं।

क्या सृष्टि की वस्तुओं में कोर्इ प्रमाण मौजूद है, जो ‘‘सृष्टिकर्ता परमेश्वर’’ को प्रकट करता हो?

पहली बात, हो सकता है कि विभिन्न जातियों, देशों और धर्मों के लोग देखने में अलग अलग नज़र आते हों और भिन्न भिन्न भाषाएं बोलते हों, विभिन्न सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से हों और उनकी त्वचा का रंग भी अलग हो लेकिन तब भी इस पृथ्वी पर प्रत्येक व्यक्ति इस बात में एक जैसा है कि सब के पास दो आँखें, दो कान, एक नाक और एक मँुह है। और ये सब अंग एक समान स्थान पर स्थापित है।

इसके अतिरिक्त जबकि, पशु, पक्षियों, किड़े मकोड़ों और मछलियों में उनके विशेष गुणों के अनुसार थोड़ा अन्तर जरूर है। लेकिन मूलरूप से उनकी बाहरी बनावट एक जैसी दिखार्इ पड़ती है। जो ये प्रमाणित करती है कि उनकी रूपरेखा और संरचना एक और केवल एक ही सृष्टिकर्ता के द्वारा की गर्इ है। यदि अनेकों सृष्टिकर्ता होते तो वे अपनी पसन्द अनुसार मनुष्य और जानवरों की बनावट और कार्य प्रणाली को निर्धारित करते और बनाते। और दूसरी ओर विकासवाद सिद्धान्त को मानने वाले यह दावा करते हैं कि मनुष्य उच्च जाति के उन जानवरों से विकसित हुआ है जो निम्न श्रेणी के जानवरों से विकसित हुए हैं।

लेकिन उत्पत्ति 1:21 में हम पाते हैं ‘‘और परमेश्वर ने विशालकाय समुद्री जल-जन्तुओं तथा प्रत्येक जीवित और तैरने-फिरने वाले जन्तु की सृष्टि की, जिनकी भिन्न भिन्न जातियों से जल बहुत ही भर गया, और इसी प्रकार हर एक जाति के उड़ने वाले पक्षियों की भी सृष्टि की, और परमेश्वर ने प्रत्येक वस्तु की सृष्टि उसकी अपनी जाति के अनुसार की। ज़मीन के प्राणी मछलियों से विकसित नहीं हुए।

और न ही पक्षी जमीन के प्राणियों से विकसित हुए। मनुष्य, बन्दर से विकसित नहीं हुआ। बन्दर आरम्भ से ही बन्दर बनाया गया। और मनुष्य आरम्भ से ही मनुष्य बनाया गया सभी प्राणियों में केवल मनुष्य ही परमेश्वर के स्वरूप में, आत्मा, प्राण और शरीर के साथ बनाया गया।

ये बात कोर्इ महत्व नहीं रखती कि बन्दर कितना भी अधिक मनुष्य जैसा क्यों न दिखार्इ देता हो लेकिन बन्दर मनुष्य के समान आत्मा से परमेश्वर को समझ या उसकी आराधना नहीं कर सकता।

दूसरी बात, प्राकृतिक घटनाओं में पाये जाने वाले प्रमाण भी स्पष्ट रूप से सृष्टिकर्ता परमेश्वर को प्रमाणित करते हैं। जैसे पृथ्वी का अपनी धूरी पर घूमना और परिक्रमा करना, विभिन्न प्राकृतिक घटनाओं से किन्तु व्यवस्थित रीति से, जिसमें रात और दिन का परिवर्तन, चार मौसम, बड़े और छोटे ज्वार भट्टा, का होना शामिल है।

आकाश में होने वाली ऐसी अवस्थायें और गतियाँ मनुष्य तथा अन्य जीवों को जीवित रखने के लिए अत्यधिक अनुकूल और उचित वातावरण बनाने के लिए स्थापित की गयी है। सूर्य और चद्रमा के बीच की दूरी या पृथ्वी और चद्रमा के बीच की दूरी, बिल्कुल ठीक रखी गर्इ है। सूर्य, पृथ्वी और चन्द्रमा एक दूसरे से न तो अधिक दूर हैं और न ही अधिक पास हैं। ये बहुत लम्बे समय से बिना थोड़ी सी भी गलती किए, व्यवस्थित रूप से अपनी धूरी पर घूम रहे और परिक्रमा कर रहे हैं।

सृष्टि की रचना अचानक किसी ‘‘बड़े धमाके’’ से नही हुर्इ है। जैसा कि विकासवाद को मानने वाले चुनौती देते हैं। उदाहरण के लिए, हम जानते हैं कि घड़ी को बड़ी सावधानी  से जटिल पुर्जो को एक  साथ इकट्ठा कर के  बनाया गया है। और वे एक साथ काम करते हैं। लेकिन मानो यदि कोर्इ कहे ‘‘ज्वालामूखी फटने के समय’’ घड़ी के सारे पूर्जे अपने आप आकर एक साथ जुड़ गए और काम करना शुरू कर दिया, तो क्या कोर्इ इस कहानी पर विश्वास करेगा?

तब कैसे ये सृष्टि जिसमें हम रहते हैं जो घड़ी से बहुत ज्यादा बड़ी है, अपने आप अस्तित्व में आ गर्इ और बड़े नियमित रूप से कार्य करने लगी लेकिन क्योंकि प्रत्येक वस्तु की रूपरेखा और रचना परमेश्वर की सर्वोच्च बुद्धि द्वारा हुर्इ है इसलिए ये सब सम्भव है। और इन कारणों से कोर्इ भी व्यक्ति न्याय के दिन कोर्इ बहाना नहीं बना सकता कि ‘‘मैने नहीं सोचा था कि परमेश्वर का अस्तित्व है’’।

वे कारण जिन से लोग परमेश्वर में विश्वास नहीं कर पाते।

फिर ऐसा क्यों है कि लोग सृष्टि के इतने स्पष्ट प्रमाणों के गवाह होने के बाद भी परमेश्वर में विश्वास करने से इन्कार करते हैं? क्योकि लोगों कि विश्वास करने की प्रवृति केवल उन वस्तुओं में होती है जिन्हें वे आँखों से देख सकें, हाथों से टटोल सकें और अपने ज्ञान और विचारों सें समझ सकें। ऐसे लोग अदृश्य परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास नही करेंगे और न ही बार्इबल में पाये जाने वाले चिन्हों, चमत्कारों या ऐसी किसी बात पर जो मनुष्य की योग्यता से बाहर हो।

लेकिन बार्इबल में प्रत्येक बात सत्य है। जैसा यीशु मसीह ने युहन्ना 4:48 में कहा ‘‘तुम लोग जब तक चिन्ह और अद्भूत काम नहीं देखोगे विश्वास नहीं करोगे’’ इसलिए जब लोग उन चिन्हों और अदभुत कार्यों को देखते हैं जिन्हें मनुष्य की योग्यता के द्वारा नहीं किया जा सकता केवल तब ही उनका ज्ञान और सोचने का ढ़ंग टुकड़े टुकड़े हो जाता है जब लोग उन वस्तुओं को देखते, सुनते और अनुभव करते हैं, जिन्हें कोर्इ मनुष्य नहीं कर सकता तब वे इस सत्य को स्वीकार करते हैं कि परमेश्वर का वचन सत्य है। फिर चाहे उनका ज्ञान, कितना भी परमेश्वर के वचन के विरूद्ध संघर्ष क्यों न करे।

परमेश्वर ने अपने सामथ्र्य के अनगिनित प्रकटीकरणों द्वारा बार्इबल के प्रसिद्ध व्यक्तियों को बार बार प्रकट किया कि वह है। जबकि, प्रेरित पौलूस ने यीशु मसीह के नाम में बीमारों और दुर्बलों को चंगा किया, दुष्टात्माओं को निकाला और मुर्दों को जीवित किया।

हमारी पीढ़ी में भी परमेश्वर के कार्यों का प्रकट होना आवश्यक है। क्योंकि अविश्वासी के लिए परमेश्वर का सामथ्र्य पक्का प्रमाण होता है, इसीलिए वे इसके द्वारा जीवित सृष्टिकर्ता परमेश्वर के विश्वास में लाए जा सकते हैं। मनमिन सैन्ट्रल चर्च की स्थापना के समय से ही इसमें अनगिनित चिन्ह और अद्भूत कार्य हो रहे हैं। और समय के बीतने के साथ साथ परमेश्वर के सामथ्र्य का प्रदर्शन और भी महान रूप से हो रहा है।

मसीह में भार्इयों और बहनों निष्कर्ष ये है कि परमेश्वर के अस्तित्व को प्रमाणित करने वाले प्रमाण सृष्टि के प्रत्येक प्राणी में, चिन्हों और अद्भूत कार्यों में और परमेश्वर के सामथ्र्य के प्रदर्शन में साफ साफ दिखार्इ देते हैं। इसलिए मैं प्रभु यीशु मसीह के नाम में प्रार्थना करता हूं की आप सभी उसकी आज्ञाओं पर चलने के द्वारा परमेश्वर के कार्यो का अनुभव कर सकें और बिना किसी रूकावट के उसे महिमा दे सकें।

 

 

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