‘‘क्रूस का संदेश-2’’

‘‘क्रूस का संदेश’’ परमेश्वर की वह गुप्त बुद्धि है जो समय (युग) के आरम्भ होने से पहले से छिपी हुर्इ है। ‘‘क्रूस का संदेश’’ श्रृंखला में मानवजाति के उद्धार के लिए परमेश्वर की योजना का वर्णन है। वे लोग जिन्होंने पहले कभी परमेश्वर को नहीं जाना, वे उससे भेंट कर पाएंगे और उसका अनुभव और नया जीवन प्राप्त करेंगे। परमेश्वर कौन है इसकी सही सही समझ होना, हमारे मसीह जीवनों में बहुत ही बुनियादी और महत्वपूर्ण बात है। मनमिन समाचार के पहले भाग को जारी रखते हुए ये ‘‘क्रूस का संदेश’’ का दूसरा भाग ‘‘वह मैं जो हूँ सो हूँ’’ है।

प्रकाशन का क्रम

परमेश्वर कौन है?

  1. वह सृष्टिकर्ता परमेश्वर है।
  2. वह ‘‘मै जो हूँ सो हूँ’’ है।
  3. वह सर्वशक्तिमान है।
  4. वह बार्इबल का लेखक है।
  1. ‘‘मैं जो हूँ सो हूँ’’

और परमेश्वर ने मूसा से कहा ‘‘मैं जो हूँ सो हूँ’’ (निर्गमन 3:14)

जबकि अनगिनित लोग इस संसार में परमेश्वर में विश्वास रखने का दावा करते हैं। लेकिन तब भी इनमें से अनेकों ने, न तो परमेश्वर के प्रेम को महसूस किया है और न ही उसका अनुभव। यहां तक कि वे अपने उद्धार के प्रति निश्चित भी नहीं हो सकते हैं। यदि उनसे पूछा जाए ‘‘किस प्रकार का परमेश्वर वह है जिसमें आप विश्वास करते हैं?’’ तो उनमें से कुछ आपको विश्वसनीय जवाब नहीं दे सकते। लेकिन जब परमेश्वर की सन्तान अपने पिता को अच्छी तरह से समझ जाते हैं तब ही वे उसके साथ संगति कर सकते हैं, और अपने उद्धार के प्रति निश्चित हो कर यीशु में आनन्दित जीवन व्यतीत कर सकते है।

जैसा कि मनमिन समाचार के पिछले अंक (प्रकाशन) में, चार-भागों की श्रृंखला के पहले सन्देश में मैंने ‘‘सृष्टिकर्ता परमेश्वर’’ को प्रमाणित किया था। मैने कहा था कि सृष्टि की प्रत्येक वस्तु का सृष्टिकर्ता केवल परमेश्वर है। परमेश्वर की सृष्टि के प्रमाण, सब वस्तुओं में मौजूद हैं, जिसे उसने अपने सामर्थ्य़ के कार्य द्वारा रचा है।

इस अंक में मैं श्रृंखला के दूसरे सन्देश को जिसका शीर्षक ‘‘मैं जो हूँ सो हूँ’’  को प्रमाणित करूंगा।

 

  1. परमेश्वर, जो बिना आदि और अन्त के है। और वह ‘‘मैं जो हूँ सो हूँ’’ है।

जब लोग सुनते हैं कि परमेश्वर ने सृष्टि कि प्रत्येक वस्तु को बनाया है, तो वे जल्दी से पूछते हैं ‘‘परमेश्वर को किसने बनाया है?’’ या ‘‘कब से परमेश्वर उपस्थित है, और उससे पहले क्या था?’’ इसके लिए निर्गमन 3:14 में ऐसा लिखा है ‘‘परमेश्वर ने मूसा से कहा ‘‘मैं जो हूँ सो हूँ’’। किसी ने भी परमेश्वर को जन्म नहीं दिया या उसे बनाया। परमेश्वर तो हमेशा मौजूद रहा है। अनन्त काल के समय से भी पहले से, वह मौजूद है। अनन्तकाल के समय को समझने की क्षमता सम्भवत: मनुष्य नही रखता, लेकिन फिर भी हर बात में जो मनुष्य ने सीखी और अनुभव की है, वहां हमेशा ‘‘आदि’’ और ‘‘अन्त’’ होते है। उदाहरण के लिए, मनुष्य और जानवरों का आदि और अन्त है। उनके मातापिता के लिए, उनका ‘आदि’ उनके जन्म के द्वारा, और उनका ‘अन्त’ कब व कैसे वे मरते है के द्वारा जाना जाता है। ये बात कोर्इ महत्व नही रखती कि वस्तु कितनी पुरानी है, लेकिन यह किसी के द्वारा किसी समय पर बनार्इ गर्इ थी। और वैसे ही सब ऐतिहासिक घटनाओं का भी आरम्भ और अन्त हुआ था। और इसी कारण से लोग स्वभाविक रूप से सोचते और हैरान होते हैं, कि कैसे परमेश्वर सबसे पहले अस्तित्व में आया होगा, मानो कि परमेश्वर के अस्तित्व में आने के आरम्भ का कोर्इ बिन्दु हो। लेकिन यदि सृष्टिकर्ता और संपूर्ण परमेश्वर की ऐसी शुरूआत हुर्इ हो तो ये तो सबसे अधिक विचित्र बात होगी। यदि इतिहास में परमेश्वर ने अपने अस्तित्व में किसी बिन्दु से आना आरम्भ किया हो तो फिर तो, लोग परमेश्वर, समय और उसकी उपस्थिति से पहले की बातों के बारे में सोचेंगे ही। और न ही फिर परमेश्वर ‘‘संपूर्ण’’ हो सकता है, यदि किसी ने उसे बनाया या जन्म दिया हो तो। इसलिए यदि परमेश्वर वास्तव मे ‘संपूर्ण’ और ‘सिद्ध’ है तो उसे वास्तव में बिना किसी आदि या अन्त के ही होना चाहिए, और स्वयं से ही उसका अस्तित्व होना ही चाहिए।

  1. परमेश्वर ज्योति और ध्वनि के रूप में विद्यमान था।                                                                                                                                                                     लेकिन उसने अपने आप को ‘परमेश्वर पिता’, ‘परमेश्वर पुत्र‘, ‘परमेश्वर पवित्र आत्मा’, की त्रिएकता में अलग किया।

हमारा परमेश्वर जो अनन्तकाल के समय से भी पहले से मौजूद था, वह कैसी शक्ल या आकार में था। यूहन्ना 1:1 हमें बताता है ‘‘आदि में वचन था और वचन परमेश्वर के साथ था और वचन परमेश्वर था।’’

यहां यह वाक्यांश ‘‘आदि में…’’ सृष्टि की वस्तुओं की रचना की गर्इ थी उससे भी अधिक पहले के समय को बताता है। जब परमेश्वर केवल स्वयं मौजूद था और यह उस युग की ओर संकेत करता है, जिसे मनुष्य जो केवल प्राणी है, अपने सीमित अनुभव या ज्ञान से कभी नही समझ सकता। इस बात पर कि परमेश्वर, जो अनन्तकाल से स्वयं से मौजूद रहा है, यूहन्ना 1:1 हमें बताता है कि ‘‘वचन परमेश्वर था’’ वह किसी विशेष शक्ल या आकार में मौजूद नही था। लेकिन वचन के ही रूप में मौजूद था और यह ‘‘ध्वनि’’ है।

1 यूहन्ना 1:5 भी हमें बताता है ‘‘वह समाचार जो हमने उस से सुना है और तुमको सुनाते हैं, वह यह है, कि परमेश्वर ज्योति है और उसमें कुछ भी अन्धकार नही।

यहाँ शब्द ‘ज्योति’ और ‘अन्धकार’ में आत्मिक महत्व है। ‘‘शब्द अन्धकार’’ में वे सब वस्तुएं आती हैं, जो सत्य नहीं हैं बल्कि अधर्मी, गैर कानूनी और पाप पूर्ण होती है। जबकि ‘‘ज्योति’’ शब्द वह सब बताता है जो सत्य है जैसे प्रेम, भलार्इ, धार्मिकता इत्यादि।

फिर भी परमेश्वर आत्मिक रूप में केवल ‘‘ज्योति’’ ही नहीं है लेकिन इस समय भी वह ‘‘ज्योति’’ के रूप में मौजूद है। परमेश्वर जो वचन है, वह बहुत ही सुन्दर और विचित्र ज्योति के मध्य में एक स्पष्ट और पारदर्शी ध्वनि के साथ मौजूद था। वह अविश्वसनीय सुन्दर ज्योति के मध्य में मौजूद था, और ऐसी ध्वनि के रूप में जो पारदर्शी, शान्त, मुलायम, प्रभावशाली और गरजने वाली थी, जो कि पूरी सृष्टि में उँची आवाज (गुंज) उत्पन्न करती थी। और कुछ करने का निर्णय लेने के समय पर, वह परमेश्वर जो ज्योति और ध्वनि के रूप में मौजूद था, उसने अपने दिल की खुशी के लिए मनुष्य की रचना की। परमेश्वर ने चाहा की वह किसी के साथ प्रेम को बाँट सके। और तब मानवीय खेती की सारी योजनाओं को पूरा करने के लिए उसने सब से पहले अपने आप को ‘‘त्रिएक परमेश्वर’’ में अलग किया। पिता परमेश्वर से, परमेश्वर पुत्र यीशु जो कि मानवजाति का आनेवाला उद्धारकर्ता और सहायक पवित्रआत्मा दोनो अलग हुए। जबकि परमेश्वर तीन (जीव तत्वों) (beings) में अलग हो गया तब भी तीनों का सार तत्व (जीवतत्व) एक सा था, इसलिए हम उन्हें ‘‘त्रिएक’’ कहते हैं।

परमेश्वर ‘‘त्रिएकता’’ में अपने आप को अलग करने के बाद से, एक विशेष स्वरूप और छवि में मौजूद है। उत्पत्ति 1:26 से हमें पता चलता की वह कैसा दिखार्इ पड़ता होगा ‘‘हम मनुष्य को अपने स्वरूप में अपनी समानता के अनुसार बनाएँ’’ दूसरे शब्दों में, जब त्रिएक परमेश्वर ने मनुष्य को बनाया, तब उसने मनुष्य के बाहरी रूप को अपने स्वरूप पर बनाया और मनुष्य का हृदय परमेश्वर के हृदय की समानता में रचा गया। लेकिन आदम के पाप करने के बाद मनुष्य का हृदय जो कि परमेश्वर के हृदय जैसा था, बुरा होता चला गया और धीरे धीरे परमेश्वर से बहुत दूर हो गया।

  1. केवल ‘‘मैं जो हूँ सो हूँ’’ ही हमारी आराधना का लक्ष्य हो।

परमेश्वर मनुष्य के समान नहीं, मनुष्य तो केवल प्राणी मात्र है। परमेश्वर तो अपने आप से अनन्तकाल से अनन्तकाल के लिए मौजूद है। केवल ‘‘मैं जो हूँ सो हूँ’’ ही सत्य और सिद्ध परमेश्वर है और वह ही हमारी आराधना और प्रेम का लक्ष्य है। लेकिन फिर भी कुछ लोग इस परमेश्वर को नहीं जानते ओर इसलिए वे मनुष्य द्वारा खोजी गर्इ मूर्तियों की उपासना करते हैं। ऐसे लोग सोने, चांदी, लकड़ी और पत्थर से मूर्तियाँ गढ़ते हैं और उनको दण्डवत करते है।

मान लें कि जिस बच्चे को आपने जन्म दिया हो वह आपको न पहचाने, और किसी अजनबी के पास जाकर उन्हें माता और पिता कह कर पुकारना शुरू कर दे तो कितनी बड़ी चोट और निराशा आपको अपने हृदय में होगी। ठीक ऐसे ही, यदि आप परमेश्वर को ढुंढने और उसकी आराधना करने की बजाय उन मूर्तियों की सेवा करेंं जिन्हें मनुष्य के द्वारा खोजा गया है? तो क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि सृष्टिकर्ता परमेश्वर को भी कितनी निराशा और दुख पहुँचेगा? इसी कारण से परमेश्वर मुर्तिपूजा से घृणा करता है।

निर्गमन 20:3-5 में परमेश्वर हम से कहता है ‘‘तू मुझे छोड़ दूसरों को र्इश्वर करके न मानना, तू अपने लिए कोर्इ मूर्ति गढ़कर न बनाना अथवा न किसी की प्रतिमा बनाना जो ऊपर आकाश में या नीचे धरती पर या धरती के नीचे जल में है। न तो तू उन को दण्डवत करना और न ही उनकी उपासना करना क्योंकि मैं तेरा परमेश्वर यहोवा जलन रखने वाला परमेश्वर हूं जो मुझ से बैर करते हैं उनकी सन्तान को तीसरी और चौथी पीढ़ी तक बापदादों की दुष्टता का दण्ड देता हूँ।’’ इसलिए केवल वह परमेश्वर जो ‘‘मैं जो हूँ सो हूँ’’ ही केवल सत्य परमेश्वर है। हमें केवल उसकी ही आराधना और सेवा करनी चाहिए।

यहां एक और बात आपको ध्यान में रखनी चाहिए कि उद्धारकर्ता यीशु जो इस संसार में आया, वह सुष्टिकर्ता परमेश्वर के ही समान था, कोर्इ पुरूष या स्त्री उसका माता-पिता नही हो सकते थे। ये सच है कि जब यीशु ने संसार में उद्धारकर्ता बनने के लिए प्रवेश किया तो उसने देहधारण की और कुवाँरी से उप्तन्न हुआ। लेकिन फिर भी मत्ति 1:18 में हम पढ़ते है ‘‘जब उसकी माता मरियम की मंगनी यूसुफ के साथ हुर्इ थी, तब उनके समागम से पूर्व ही वह पवित्र आत्मा की ओर से गर्भवती पार्इ गर्इ थी’’। यहां मरियम को यीशु की ‘‘माता’’ बताने का कारण केवल ये है, क्योंकि ये बात यीशु के एक शिष्य के द्वारा लिखी की गर्इ थी। यीशु किसी पुश्तैनी प्रभाव से जो कि यूसुफ के शुक्राणु और मरियम के अण्डाणु से मिला हो, पैदा नहीं हुए। बल्कि वह पवित्र आत्मा के सामर्थ्य़ द्वारा उप्तन्न हुए थे। परमेश्वर ने कुवाँरी मरियम को एक साधन के रूप में उपयोग किया कि उद्धारकर्ता उसके गर्भ में हो।

बार्इबल में अनेकों स्थानों पर हम देखते हैं जब यीशु कुवाँरी मरियम को ‘‘माता’’ नहीं कहते बल्कि ‘‘हे नारी’’ कहते हैं। कोर्इ भी स्त्री जो केवल प्राणी है कभी भी सृष्टिकर्ता परमेश्वर की माँ नहीं बन सकती। कुछ लोग कुवाँरी मरियम की आराधना और प्रशंसा करते हैं जैसे की वे स्वयं परमेश्वर की आराधना कर रहे हों। लेकिन आपको हमेशा याद रखना चाहिए कि त्रिएक परमेश्वर के अलावा कोर्इ भी प्राणी कभी भी हमारी आराधना का लक्ष्य नहीं हो सकता।?

यीशु मसीह में मेरे प्यारे भार्इयो और बहनों,

ये बात हमेशा ध्यान में रखते हुए कि सृष्टिकर्ता परमेश्वर जिसमें हम विश्वास करते हैं वह ‘‘मैं जो हूँ सो हूँ’’ है और वह ही केवल सच्चा परमेश्वर है, मैं प्रभु यीशु मसीह के नाम में प्रार्थना करता हूं कि केवल उसकी आराधना करने के द्वारा काश!, आपमें से प्रत्येक जन, यीशु मसीह में आशीषित जीवन व्यतित कर सकें।

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