अध्याय 2- मानवजाति का सृष्टिकर्ता

अध्याय-2

मानवजाति का सृष्टिकर्ता

क्योंकि लोग स्कूल मे केवल डार्विन के सिद्धांतो को पढ़ते और सीखते है। और वे इस तथ्य को कि परमेश्वर ही सृष्टीकर्ता है  बिना सत्य को खोजे नकारते है। परन्तु पवित्र बाइबल सृष्टीकर्ता परमेश्वर के अस्तित्व को बताती है। जब परमेश्वर के अलावा कुछ नही था।

उत्पति की पुस्तक जो कि बाइबल मे सम्मिलित 66 पुस्तकों मे से एक है। परमेश्वर के सृष्टी के कार्य को विस्तार से बताती है। उत्पति 1:1 मे लिखा है आदि मे परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी का रचना की। और इस तथ्य पर कि परमेश्वर ही सृष्टीकर्ता है प्रकाश डालती है। उत्पति विस्तार से इस तथ्य को कि जगत और जो कुछ इस में है परमेश्वर ने अपनी बुद्धि के अनुसार सब की रचना की। उत्पति की पुस्तक इस बात पर आधरित है। कि जैसा कि परमेश्वर के विचार मे था कि मनुष्य परमेश्वर की इच्छा और स्वर्ग की लालसा के अनुसार जीवन व्यतीत करें।

इस के विपरित डार्विन का सिद्धांत कहता है कि सब की उत्पति अपने आप से हुई है। केवल वे जीव जो जीवन के संर्घष मे सबसे उच्च थे जीवित रहें और यह भी कहा गया है कि मनुष्य की उत्पति वानर से हुई है। और क्योंकि वे परमेश्वर के अस्तित्व पर विश्वास नही रखते है उनका जीवन का उदेश्य संसारिक खुशियों के अनुसार जीवन व्यतीत करना है। यह मनुष्य आधारित विचार है।

जब से डार्विन ने अपना सिद्धांत प्रस्तुत किया तब से बहुत से लोगों का मानना है कि यह ही सत्य है।परन्तु आज ऐसे प्रमाण है कि बहुत से जीवों की उत्पति डार्विन के सिद्धांतो से बहुत जटिल और वैज्ञानिक है। और डार्विन ने स्वयं ही उसे नकारा है। यह इसलिए हुआ कि डार्विन का सिद्धांत जो कहता है कि मनुष्य की उत्पति स्वयं ही हुई है यह सिद्धांत थर्मोडाइनैमिक्स के 1 और 2 सिद्धांत और भूगोंल के अनुसार सही नही है। इस के अतिरिक्त वे लोग जो डार्विन के सिद्धांत को मानते है। और कहते है जांवा मैन जो कि 50,000 साल पहले था वही पहला मनुष्य था जिसकी हड्डियां पाई गई है।

परन्तु यह तथ्य जर्मन के वेज्ञानिकों के द्वारा रद्द कर दिया गया। और यह प्रमाणित किया गया कि निएनड्रल मैन एक ऐसा मनुष्य था जिसके कुभ था और  उसमे विटामिन डी की कमी पाई जाती है।

इसलिए डार्विन का सिद्धांत न तो परमेश्वर कें अनुसार सही है और न ही वैज्ञानिकों के प्रमाणों के अनुसार सही है। इस सब के बावजूद डार्विन ने उत्पति को नही स्वीकार किया और अपने दियें गए सिद्धांत को सही प्रमाणित करने के लिए कोशिश करता रहा। इसलिए बाइबल कहती है कि वे जिन्होने परमेश्वर के सत्य को झूठ से बदल दिया और सृष्टी की वस्तुओं की आराधना की न की सृजनहार की । रोमियों 1:25-28 मे लिखा है। इस संसार मे कुछ भी ऐसा नही जो किसी के द्वारा न बनाया गया हो। बच्चों के खिलौनो से लेकर उड़ते हवाई जहाज तक, हर चीज का अस्तित्व है क्योंकि हर एक चीज किसी न किसी के द्वारा बनाई गई है।

यहां तक की सड़को पर खड़ी इमारतें भी उनके मालिकों द्वारा अपने अनुसार बनाई गई हैं और ये इमारतें मजदूरों द्वारा मालिक के कहें अनुसार बनाई हुई है। इसी प्रकार पृथ्वी और स्वर्ग मे जो कुछ भी है वह परमेश्वर ने अपनी बुद्धि के अनुसार बनाया है।

इसलिए रोमियो 1:25 कहता है। परमेश्वर ही सृष्टीकर्ता है। और बाइबल मे बहुत से ऐसे पद है जो यह प्रमाणित करतें है कि परमेश्वर ने स्वर्ग और पृथ्वी की रचना अपने वचनों के द्वारा की। इब्रानियों 11:3 पद कहता है। विश्वास ही से हम जान जाते हैं, कि सारी सृष्टि की रचना परमेश्वर के वचन के द्वारा हुई है। यह नहीं, कि जो कुछ देखने में आता है, वह देखी हुई वस्तुओं से बना हो।

रोमियों 11:36   कहता है कि क्योंकि उस की ओर से, और उसी के द्वारा, और उसी के लिये सब कुछ हैः उस की महिमा युगानुयुग होती रहेः आमीन।।

इसके अतिरिक्त 1 यूहन्ना 1:3 कहता है जो कुछ हम ने देखा और सुना है उसका समाचार तुम्हें भी देते हैं, इसलिये कि तुम भी हमारे साथ सहभागी हो; और हमारी यह सहभागिता पिता के साथ, और उसके पुत्र यीशु मसीह के साथ है।

इसका प्रमाण की परमेश्वर सृष्टीकर्ता है न केवल बाइबल में है परन्तु सृष्टी मे बहुत सी ऐसी चीजें है जो इस बात को प्रमाणित करती है। यहां पर उत्तर , दक्षिण, पूरव , पश्चिम, गर्मी , सर्दी , बसंत और बहुत सी चीजें है। पृथ्वी का चक्कर लगाना और पराक्रम करना , समुद्र मे लहरों का उठना और गिरना, हवा का चलना और बादल और इसके अतिरिक्त सृष्टी की सभी वस्तुऐं परमेश्वर के आदेशानुसार नियमित रूप से नियत्रण में है। तो हम कैसे कह सकतें है कि ये सब चीजें सवयं से  बनी है। न कि परमेश्वर के द्वारा? और यह भी कि इस संसार मे जितने पशु, पक्षी और मच्छलियां सभी की दों आखें एक नाक और एक मुह और दो कान है। और सभी अपने अपने स्थान पर है। और यह देखकर हम पता लगा सकतें है कि सृष्टीकर्ता एक ही है।

इसलिए रोमियों 1:19 – 20 कहता है। इसलिये कि परमेश्वर के विषय में ज्ञान उन के मनों में प्रगट है, क्योंकि परमेश्वर ने उन पर प्रगट किया है।  क्योंकि उसके अनदेखे गुण, अर्थात् उस की सनातन सामर्थ, और परमेश्वरत्व जगत की सृष्टि के समय से उसके कामों के द्वारा देखने में आते है, यहां तक कि वे निरूत्तर हैं।

इसलिए कोई भी यह बहाना नही बना सकता कि उसने इसलिए विश्वास नही किया क्योंकि वह पमरेश्वर को नही जानता था।

परमेष्वर ने मुनष्य की सृष्टी की है।

परमेश्वर जो सृष्टीकर्ता है। उसने मनुष्य को अपने ही स्वरूप में बनाया है। उत्पत्ति 1:27- 28 इस प्रकार से कहता है। कि तब परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया, अपने ही स्वरूप के अनुसार परमेश्वर ने उसको उत्पन्न किया, नर और नारी करके उस ने मनुष्यों की सृष्टि की। और परमेश्वर ने उनको आशीष दी : और उन से कहा, फूलो-फलो, और पृथ्वी में भर जाओ, और उसको अपने वश में कर लो; और समुद्र की मछलियों, तथा आकाश के पक्षियों, और पृथ्वी पर रेंगनेवाले सब जन्तुओ पर अधिकार रखो।

फिर कैसे परमेश्वर ने मनुष्य की रचना की।

उत्पत्ति 2:7 कहता है। और यहोवा परमेश्वर ने आदम को भूमि की मिट्टी से रचा और उसके नथनो में जीवन का श्वास फूंक दिया; और आदम जीवता प्राणी बन गया।

परमेश्वर ने मनुष्य की रचना अपने स्वरूप में की। परमेश्वर ने मनुष्य की रचना संमपूर्ण रूप से की और उसके आंतरिक अंगों को भी बनाया, श्वांस लेने के लिए तथा पाचन के लिए। परन्तु क्योंकि मनुष्य इन्ही अगां के साथ नही चल सकता है इसलिए परमेश्वर ने आदम के नथनों मे जीवन का श्वांस फूकां ताकि वह जीवित प्राणि बन जाएं।

इस कथन को आसानी से समझने के लिए हम एक जलती हुई ट्यूब लाइट के बारे मे सोंच सकते है। ट्युब लाइट जलें इसके लिए हमे उसमे बल्ब लगाना पड़ता है। और फिर ट्यूब लाइट को बिलजी के स्रोत से जोड़ना पड़ता है। परन्तु अभी भी वह ट्यूब लाइट नही जलेंगी। हमे स्वीच को चालू करना पडे़गां कि उसमे से बिजली बहें और वह ट्यूब जल जाएं।

मनुष्य एक जीवित प्राणी बना क्योंकि परमेश्वर ने उसके नथनों मे जीवन का श्वास फूंक दिया। फिर भी मनुष्य जो एक प्राणी है उसने कम्पयूटर बनाया और विज्ञान के जरीये पूरे विष्व की छानबीन की ।तो यह परमेश्वर के लिए कितना आसान है कि वह संसार और मनुष्य की रचना करें और सब कुछ नियत्रिंत करें। परमेश्वर जो सृष्टीकर्ता है वह सर्वशक्तिमान है। और वह कुछ भी कर सकता है। परमेश्वर जो प्रेमी परमेश्वर है उसने सब कुछ की रचना की है। और ऐसा पर्यावरण बनाया जिसमे मनुष्य रह सकता है। उसने हवा बनाई कि हम श्वास लें सकें और और भी जीव बनाएं जिन पर मनुष्य राज कर सकें। फिर परमेश्वर ने मनुष्य की रचना की और उसके नथनों मे जीवन की श्वांस फूंक दिया । ताकि मनुष्य श्वांस ले सकें और जीवन के साथ चल सकें।

परमेश्वर ने मनुष्य को सब सिखाया।

मनुष्य की सृष्टी करने के बाद परमेश्वर मनुष्य को अदन की वाटिका मे ले आया और उसको आज्ञा दी वह कि वह अदन की वाटिका की रक्षा करें और उस जगह पर राज्य करें। फिर परमेश्वर ने मनुष्य को सब सिखाना शुरू किया और ऐसी चीजें सिखाई जो अदन की वाटिका मे रहने के लिए जरूरी थी। एक नवजात शिषु कुछ नही कर सकता परन्तु जो कुछ इस संसार मे अपने माता पिता भाई बहन और अध्यापक से सिखता है वही करता है। इसलिए परमेश्वर जो सृष्टीकर्ता है  उसी ने मनुष्य को सब वस्तुओं के साथ सांमजय बनाना सिखाया। आत्मिक नियम सिखाए और सत्य के वचन सिखाए। परमेश्वरने मनुष्य को वह सब बातें सिखाई जो उसके लिए आवश्यक थी।

उत्पत्ति 2:16-17 मे कहता है। तब यहोवा परमेश्वर ने आदम को यह आज्ञा दी, कि तू बाटिका के सब वृक्षों का फल बिना खटके खा सकता हैः  पर भले या बुरे के ज्ञान का जो वृक्ष है, उसका फल तू कभी न खाना : क्योंकि जिस दिन तू उसका फल खाए उसी दिन अवश्य मर जाएगा।

जैसे माता पिता अपने बच्चों को सिखाते है तुम यह खा सकतें हो पर यह न खाना, परमेश्वर ने भी मनुष्य को विस्तार से सिखाया।

परन्तु जब बहुत समय बीत गया मनुष्य परमेश्वर की आज्ञाओं को भूलने लगा और अंत मे धूर्त सर्प के द्वारा पैदा की गई लालसा में पड़ गया। मनुष्य ने वह फल खा लिया जिसको न खाने की आज्ञा परमेश्वर ने उसे दी थी इसके परिमाणस्वरूप मनुष्य पर मृत्यु आई। और उसकी आत्मा मर गई और वह देह रह गया जो हमेशा के लिए नही जी सकता।

पमरेश्वर सर्वज्ञानी और सर्वयापी है। तो वह पहले से ही जानता था कि मनुष्य अनाज्ञाकारिता करेगा। परन्तु क्योंकि परमेश्वर प्रेमी परमेश्वर है। उसने मनुष्य की रचना की और सब भली बातें मनुष्य को सिखाई और परमेश्वर चाहता था कि मनुष्य परमेश्वर की संतान बने जो एक आशिषित जीवन जीएं।

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