अध्याय 3-परमेश्वर मनुष्य की खेती करता हैं ।

अध्याय 3

परमेश्वर  मनुष्य की खेती करता हैं ।
1. परमेश्वर ने मनुष्य की खेती की।
बाइबल मे यीशु मसीह जब कुछ आत्मिक बातें करते थे तो लोगो के लिए समझना कठिन होता था। तो यीशु मसीह हमेशा दृष्टांतों का उपयोंग करते थे। बाइबल मे बहुत से ऐसे दृष्टांत है जैसे बीज बोने का दृष्टांत, कटनी और दाखलता का दृष्टांत। यह हमे बताता है कि परमेश्वर मनुष्य की खेती कर रहा है। और कटनी के समय भूसी को गेहूँ से अलग करेगा। तो इसका क्या कारण है, कि परमेश्वर मनुष्य की खेती इस पृथ्वी पर कर रहा है। निर्गमन 3:14 मे “पमरेश्वर मै जो हूँ सो हूँ“ “अल्फा और ओमेगा“ “पहला और अन्तिम“ (प्रकाशितवाक्य  22:13)
उसमे परमेश्वरत्व और मनुष्यत्व दोनो है। क्योंकि वह पमरेश्वर है इसलिए वह सर्वशक्तिमान है। जिसने पूरी सृष्टी की रचना की है और उसका अधिकार जीवन, मृत्यु, भाग्य, मानवजाति और उनके इतिहास पर है। और जैसे कि उसमें मनुष्यत्व भी है उसने मनुष्य की रचना की और वह अपना प्रेम मनुष्य के साथ बांटना चाहता है।
पमरेश्वर सच्ची संतान चाहता है जो अपनी स्वतंत्र इच्छा से अपने हृदय से उससे प्रेम करें जिनमें भावना हो । न कि स्वर्गदूतों की तरह जो रोबोट की तरह बिना किसी शर्त के आज्ञा मानते है।
यह इसी प्रकार है जैसे हम रोबोट से ज्यादा अपने बच्चों से प्यार करतें है। यहां तक कि रोबोट हमारे फायदे के लिए बहुत सा काम कर सकता है। और बहुत प्यारा दिखता है। इसी कारण परमेश्वर ने जो कि सृष्टीकर्ता है। जिसने मनुष्य को अपने ही स्वरूप में बनाया, उसके नथनों में जीवन का श्वास फंूक दिया ,उसने मनुष्य को स्वतत्रं इच्छा दी और उसकी खेंती करना शुरू किया। जब माता पिता बच्चो को जन्म देते है और उनको पालते पोसतें है वे अपने प्रयासों को बेाझ नही समझते क्योंकि वे आशा रखते है कि जब उनके बच्चे बड़े हो जाऐगें तो उनके लिए आनंद का कारण बनेगें।
ठीक उसी प्रकार जब पमरेश्वर ने मनुष्य की रचना की तो वह बहुत ही आनंदित हुआ, परन्तु परमेश्वर पछताया क्योंकि आदम के पाप मे पड़ने के बाद आदम की आत्मा मर गई और संसार पाप से भर गया और मनुष्य जो भी विचारता था वो पाप से भरा होता था। परन्तु उसकी ऐसी संतान होेगी जो सच्चे बच्चें होगें और उसको बहुत प्रेम करेगें, वह अब तक मनुष्य की खेती कर रहा है।

2. क्या कारण है कि परमेश्वर गेहूँ को भूसी से अलग  करते है?
मत्ती 3:12 कहता है उसका सूप उस के हाथ में है, और वह अपना खलिहान अच्छी रीति से साफ करेगा, और अपने गेहूँ  को तो खत्ते में इकट्ठा करेगा, परन्तु भूसी को उस आग में जलाएगा जो बुझने की ही नहीं।
यह इस बात को बताता है कि यीशु फिर से इस पृथ्वी पर आएगें और गेहूँ और भूसी को अलग करेगें। ठीक जिस प्रकार एक किसान बीज बोता है फसल उगाता है और फल काटता है और गेहँ को भूसी से अलग करता है ।
परमेश्वर हमारी खेती कर रहा है और जब समय आएगां तब वह गेंहॅू को भूसी से अलग करेगा। और पमरेश्वर की सच्ची संतान (जोकि की गेहूँ है) स्वर्ग मे प्रवेश करेगी और अन्नत जीवन को प्राप्त करेगी। परन्तु उनकी सहायता नही करेगा और उनको छोड़ देगा जो उसकी सच्ची संतान नही है (जोकि भूसी है) और वे मृत्यु की ओर जाएगें। कुछ लोगों को आश्चर्य होगा, प्रेमी परमेश्वर क्यों कुछ ही लोगों को उद्धार की तरफ ले जाएगा लेकिन दूसरे लोगों को मृत्यु की ओर जाने दे रहा है। परन्तु हम यह समझ सकते है कि परमेश्वर यह किसी उदेश्य से यह नही करता । पमरेश्वर सिर्फ मनुष्य को वो वापस कर रहा है जो मनुष्य करता है। मनुष्य बोता है और पमरेश्वर उसे वही काटने को देता है।
तो परमेश्वर की दृष्टी मे भूसा और गेहूँ क्या है।?
वो जो पमरेश्वर से प्रेम रखते है और उसके वचनो पर चलते है वे गेहूँ है । और वे जो परमेश्वर का अनुसरण नही करते है वे भूसी है। जैसे की किसान को भूसी को जलाना पड़ेगा जो कि कुछ काम कि नही हैं
स्वर्ग इतनी सुन्दर जगह है जिसको हम कल्पना भी नही कर सकते है और परमेश्वर अच्छा और पवित्र है इसलिए पमरेश्वर स्वर्ग के राज्य को ऐसे लोग जो भूसी के समान है उनको स्वर्ग मे ला कर स्वर्ग को अपवित्र नही करना चाहता। परमेश्वर अन्त मे गेहूँ और भूसी को अलग-अलग करेगा। वह गेहँू को आशिषित करेगा कि वो स्वर्ग के राज्य मे प्रवेश करें और हमेशा के लिए पमरेश्वर के साथ रहे और इसके विपरीत वह उनको जिन्होने परमेश्वर के अनुसार जीवन व्यतीत नही किया है और इस संसार के साथ चलें, वह उनको आग मे डालेगा।

3. मनुष्य की सभ्यता का इतिहास
पमरेश्वर ने पहले मनुष्य को बनाया और उसको अदन की वाटिका मे ला कर रख दिया और उसको अदन की वाटिका की सुरक्षा करने की आज्ञा दी और उसको हर जीव के ऊपर स्वामी ठहराया।
परमेश्वर ने मनुष्य को आशिष दी की वे बढ़े और पृथ्वी को भर दें लेकिन क्योंकि आदम ने पमरेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन किया और भले और बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल खाया जिसको खाने के लिए परमेश्वर ने उसको मना किया था। इस कारण आदम को अदन की वाटिका से निकाल दिया गया और पृथ्वी पर फैंक दिया गया। उसी समय से परमेश्वर इस पृथ्वी पर मनुष्य की खेती कर रहा है।
इसका क्या कारण है कि पमरेश्वर ने आदम के द्वारा इस पृथ्वी पर बीज को बोया और तब से मनुष्य की खेती कर रहा है। जैसे कि किसान सिर्फ एक वर्ष के लिए खेती नही करता परन्तु वह अपनी फसल बार बार उगाता रहता है परमेश्वर भी आदम के अनाज्ञाकारिता के समय से खेती कर रहा है । परमेश्वर ने आदम को बीज दिया कि वह अपने वंश को फैलाए और तब से ही पमरेश्वर बो और काट रहा है। इसलिए यदि पापी जो आदम की अनाज्ञाकारिता के कारण मृत्यु की ओर बढ़ रहे है यदि वे यीशु मसीह को स्वीकार करें ताकि वे धर्मी बन जाएं तो वे गेंहूँ बन सकते है।
जबकि वे जो पापी ही बने रहते है क्योंकि वे पमरेश्वर के प्रति अपना हृदय नही खोलते और प्रभु यीशु मसीह को ग्रहण नही करतें और वो जो परमेश्वर के वचन के अनुसार अपना जीवन नही जीतें है परन्तु आज्ञा का उल्लंघन करते रहते ह वे भूसी बन जाते है। और अंत में मृत्यु को पहुँच जाते है।
इसलिए मानव की खेती उस समय से जारी है जब से आदम ने पाप किया और उसकी आत्मा अनाज्ञाकारिता के कारण मर गई और यह तब तक जारी रहेंगा जब तक यीशु मसीह दोबारा इस पृथ्वी पर मनुष्यों को बचाने न आ जाए।
आदम ने जब तक अनाज्ञाकारिता नही की थी उस समय तक मनुष्य गिनती मे बढ़ते रहें थे और पूरी पृथ्वी पर राज्य कर रहें थे ।वे जब तक परमेश्वर के वचन का पालन करते रहें तब तक उनकी खेती परमेश्वर नही की। उस समय के दौरान सभी मनुष्य परमेश्वर के वचन के अनुसार जीते थे। और मनुष्य की खेती उस समय सच्ची संतान पाने कि लिए नही की जा रही थी।
डार्विन और भूगोलिय वैज्ञानिकों ने बाइबल को गलत समझा और कहा कि “बाइबल गलत है“ क्योंकि यह कहती है कि मानवजाति की शुरूआत कुछ हजारों वर्षाे पूर्व ही हुई है। और वे ऊपर दिए गये तथ्यों को नही जानते थें। यहां तक कि आदम की अनाज्ञाकारिता करने से पहले ही मानव का इतिहास मौजूद है जिसमे वे अदन की वाटिका मे रहते थे और वे गिनती मे बढ़ते रहे थे। आदम कि अनाज्ञाकारिता के बाद ही मनुष्यों पर मृत्यु आई । अगर हम इस तथ्य को महसूस करें तो हम उत्पति को स्वीकार करेगें।
इसलिए 6000 साल से पहले के मानव का एक भी अवशेष अभी तक नही मिला है। फिर भी क्योकि लोग डार्विन के सिद्धांत को सिखाते है। वे नही जानते कि परमेश्वर सृष्टीकर्ता है। वे लोग मृत्यु कि ओर चले जाते है। जबकि वे जो बाइबल के वचनो पर विश्वास करतें है जो कि इस प्रकार शरू होती है। “आदि मे परमेश्वर ने स्वर्गाे और पृथ्वी की रचना की“ वे परमेश्वर को ढूंढते है और वे उसकी स्तुति करतें है और वे परमेश्वर के अनुसार जीवन जीते है।

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