अध्याय 4-मनुष्य को अनाज्ञाकारिता के कारण मृत्यु का सामना करना पड़ां।

अध्याय 4

मनुष्य को अनाज्ञाकारिता के कारण मृत्यु का सामना करना पड़ां।

1.मनुष्य को पृथ्वी शासन करने और वश मे करने का अधिकार दिया गया।

पमरेश्वर जो सृष्टीकर्ता है उसने मनुष्य को अपने ही स्वरुप मे बनाया और मनुष्य को यह अधिकार दिया कि वह पृथ्वी पर राज्य करे और हर एक जीव को अपने वश मे कर लें । इस प्रक्रिया का वर्णन अत्पति 2 अध्याय मे विस्तार से किया गया है। परमेश्वर ने मनुष्य को मिटटी से बनाया और उसके नथनो मे जीवन का श्वास को फूंक दिया। फिर परमेश्वर ने मनुष्य को अदन की वाटिका मे लाया जहां बहुत सारे सुदंर वृक्ष थे जो कि स्वादिष्ट फलों से लदे थे।

परमेश्वर ने मनुष्य को अदन की वाटिका की रक्षा करने और अधिकार की आज्ञा दी और इस के साथ परमेश्वर ने आदम को चेतावनी भी दी कि वह वाटिका के सब वृक्षों के फलो का बिना खटके खा सकता है पर भले और बुरे के ज्ञान का जो वृक्ष है उसका फल कभी न खाना क्योकि जिस दिन तु उसका फल खाएगा उसी दिन अवश्य मर जाएगा। (उत्पति 2:16-17)

परमेश्वर का यह विचार था कि आदम का अकेला रहना अच्छा नही इसलिए परमेश्वर ने आदम के लिए एक ऐसा सहायक बनाया जो आदम से मेल खाऐ। ओर परमेश्वर ने आदम कि एक पसली से स्त्री को बना दिया। और परमेश्वर ने उन्हे एक तन कर दिया। इसके अलावा  परमेष्वर ने आदम को प्रत्येक पशु और पक्षी के नाम रखने को कहा।

परमेश्वर जो स्वंय सत्य और भलाई है उसने मनुष्य को अपने बारे मे और संसार मे जो कुछ है सब के बारे मे मनुष्य को सिखाया और इसके साथ ही परमेष्वर ने मनुष्य को आत्मिक नियम भी सिखाए। क्योंकि परमेश्वर ने मनुष्यों को भलाई और सत्य के वचन सिखाए थेे, आदम ने परमेष्वर के वचनो का पालन किया और एक लम्बे समय तक आत्मा के जन के समान शान्ति से जीवन बिताया। जैसे कि परमेश्वर ने आदम को आशीष दी थी कि फूलों फलों और पृथ्वी पर भर जाओ और उसको अपने वश मे कर लो और समुद्र की मच्छलियों तथा आकाश के पक्षियों और पृथ्वी पर रेंगनेवाले सब जन्तुओं पर अधिकार रखो। उसके अनुसार आदम और हव्वा के बहुत से बच्चे हुए और उन्होने अदन की हर एक वस्तु पर अपना अधिकार कर लिया।(उत्पति 1:28)

2.मनुष्य का सर्प के प्रलोभन मे आकर अनाज्ञाकारिता करना

परमेश्वर ने मनुष्य की उत्पति की, उन्हे आशिष दी और उसे बहुत अधिक प्रेम किया। परमेश्वर ने केवल भले और बुरे के ज्ञान के वृक्ष से कुछ खाने के लिए मना किया था जो कि परमेश्वर द्वारा दी गई प्रभुता को दर्शाता है। केवल इसको छोड़ परमेश्वर ने मनुष्य को अपने पुत्र होने का अधिकार दिया और बहुतायत के जीवन को जीने की आशिष दी।

परंतु बहुत समय बीतने पर मनुष्य ने परमेश्वर कि आज्ञाओं की उपेक्षा करना शुरू कर दिया। उस समय शैतान जो कि एक मौके की तालाश मे था मनुष्य को धुर्त सर्प के द्वारा प्रलोभित किया।उस समय सर्प मनुष्यों के बहुत करीब था और मनुष्य सर्प को बहुत प्रेम भी करता था क्योंकि सर्प कोमल, स्वच्छ , लम्बा ओर गोल था। इसलिए शत्रु शैतान ने मनुष्य को सर्प के द्वारा प्रलोभन दिया जो कि सभी पशुओं मे बहुत धुर्त और मनुष्य के बहुत करीब था।यहांत तक कि आज भी दुष्ट मनुष्य को उन्ही चीजो या उनके द्वारा पाप मे डालता है जिन्हे मनुष्य सबसे ज्यादा प्रेम करता है। शैतान लोगों से इसलिए पाप करवाता है क्योकि मनुष्य की प्रेरणा पाप करना ही है।

इसलिए हमे हमेशा प्रार्थना करते रहना चाहिए और सत्य के वचनो को पहचानने की कोशिष करनी चाहिए ताकि हम परिक्षा मे न पड़े। यहां तक कि आज भी मनुष्य सर्प से बैर करता है क्यांकि सर्प मनुष्य के गिरने का कारण बना और मनुष्य का शत्रु बन गया इसलिए लोगों को सर्प से घृणा होती है। तो सर्प ने मनुष्य को किस प्रकार प्रलोभित किया कि मनुष्य ने परमेश्वर की आज्ञा को तोड़ दिया। सर्प यह जानता था कि परमेश्वर ने सिर्फ भले और बुरे के ज्ञान के वृक्ष मे से खाने के लिए मनुष्य को मना किया है। इसलिए सर्प ने स्त्री से बड़ी चतुराई से कहा क्या यह सच है कि परमेश्वर ने कहा तुम इस वाटिका के किसी वृक्ष का फल न खाना?

इस पर स़्त्री ने सर्प से कहा इस वाटिका के वृक्षों के फल हम खा सकतें है पर जो वृक्ष वाटिका के बीच मे है उसके फल के विषय मे परमेश्वर ने कहा है कि न तो तुम उसका फल खाना और न ही छुना नही तो मर  जाओंगे।

परमेश्वर ने साफ कहा था कि तुम निश्चय मर जाओगे लेकिन स्त्री के कुछ अस्पष्टता से उत्तर दिया नही तो तुम मर जाओगे। यह इस बात का प्रमाण है कि स्त्री ने परमेश्वर के वचनो को अपने हृदय मे नही रखा था और यह भी कि उसने परमेश्वर के इन वचनो पर पूरा विश्वास नही किया परन्तु थोड़ा सदेंह किया।

इसलिए सर्प ने स्त्री को और भी साहस के साथ यह कह कर बहका लिया । सर्प ने स्त्री से कहा तुम निश्चय नही मरोगे। परमेश्वर स्वयं यह जानता है कि जस दिन तुम उसका फल खाओगे उसी दिन तुम्हारी आखें खुल जाएगी और तुम भले और बुरे का ज्ञान पाकर परमेश्वर के तुल्य हो जाओंगे। अन्ततः मनुष्य ने परमेश्वर के वचनो की अनाज्ञाकारिता की और जो फल परमेश्वर ने खाने को मना किया था वह मनुष्य ने खा लिया। (उत्पति 3:16)

यहां तक कि आज भी शत्रु दुष्ट और शैतान धूर्तता से उन मनुष्य पर कार्य करता है जो परमेश्वर के वचन के प्रति दृढ़ नही है। उदाहरण के लिए वो पुछते है क्या तुम्हे सचमुच इक्टठा होना होता है? क्या तुम्हे सच मे प्रार्थना मे परमेश्वर को पुकारना होता है?। और भी बहुत तरह के प्रश्न वो आपसे पूछते है। ये सब सीधे तौर पर परमेश्वर के वचन है जिनका पालन तथा अभ्यास बहुत से विश्वास के पिताओं ने किया। ये सब बातें परमेश्वर को भाती है। परन्तु शैतान प्रायः उनके मन मे ऐसे सन्देह उत्पन्न करता है जो परमेश्वर मे स्थिर विश्वास नही करते है।

इसलिए 1 पतरस 5:8-9 मे लिखा है सचेत हो और जागते रहो क्योंकि तुम्हारा विरोधी शैतान गजर्नेवाले सिह के समान इस खोज मे रहता है कि किस को फाड़ खाएं। विश्वास मे दृढ़ होकर और यह जानकर उसका सामना करो कि तुम्हारे भाई जो संसार मे है ऐसे ही दुख सह रहें है। हमे सत्य की चटटान पर स्थिर खड़ा होना है ताकि बहक न जाएं लेकिन विश्वास से जीत प्राप्त करें। अगर हम शैतान को प्रभु यीशु के नाम से रोकते है और सत्य मे बने रहते है और संसार से समझोता नही करते है तो,  परमेश्वर हमारी रक्षा करता। पर यदि हम सत्य मंे नही रहतें है । तो शैतान हमारे जीवन मे कार्य करता है। जैसा कि इफिसियो 6:11 मे लिखा है। परमेश्वर के सारे हथियार बांध लो कि तुम शैतान की युक्तियों के सामने खड़े रह सको। हम परमेश्वर के सत्य वचन के हथियार के द्वारा शैतान का सामना कर सकते है। तथा शत्रु दुष्ट और शैतान के द्वारा उत्पन्न अभिलाषाओं और लालसाओं को दूर कर सकतें है। जैसा मती 5:18-19 मे लिखा है उसके अनुसार हमे समझना चाहिए। कि जब तक आकाश और पृथ्वी टल न जाएं, तब तक व्यवस्था से एक मात्रा या बिन्दु भी बिना पूरा हुए नहीं टलेगा। इसलिये जो कोई इन छोटी से छोटी आज्ञाओं में से किसी एक को तोड़े, और वैसा ही लोगों को सिखाए, वह स्वर्ग के राज्य में सब से छोटा कहलाएगा;

3.पाप की मजदुरी के कारण मनुष्य को मृत्यु मे गिरना पड़ा।

क्योंकि हव्वा शत्रु दुष्ट और शैतान का विरोध न कर सकी , शैतान ने उसके मन मे विचारों के द्वारा लालसा उत्पन्न की और तब भले और बुरे के ज्ञान का वृक्ष उसे पहले से अलग दिखाई पड़ा। अर्थात हव्वा को वह वृक्ष देखने मे सुन्दर , खाने मे मनभाऊ और बुद्धि के लिए चाहने योग्य दिखाई पड़ा। इसलिए हव्वा ने स्वयं वह फल खाया तथा आदम को भी उसे खाने के लिए दिया। क्योंकि हव्वा शैतान को परमेश्वर के वचन का उपयोग कर के दूर नही कर सकी इस कारण वह शरीर और आखों की लालसा तथा जीवन का घमंड दुर न कर सकी। और अंत मे उस ने परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन किया और पाप मे पड़ गई। और परमेश्वर के इस वचन के अनुसार तुम निश्चय मरोगे , मनुष्य पर मृत्यु आई। मनुष्य जो कि आत्मा, प्राण और शरीर से बना था इस पाप के पश्चात मनष्य की आत्मा मर गई और मनुष्य का परमेश्वर से सम्र्पक टूट गया। प्राण और शरीर को शैतान के अधिकार के कारण दुख उठाना पड़ा। और मनुष्य पर पड़े श्राप के कारण मनुष्य अपने पसीने की कमाई से ही खा सकता था। स्त्री के जन्म देने तथा उसके पति की ओर उसकी अभिलाषा बढ़ गई और स्त्री पर उसके पति का अधिकार बढ़ गया। धूर्त सर्प जिसने मनुष्य को पाप मे डाला। स्वयं भी श्रापित हो गया। सर्प को श्राप मिला कि तू पेट के बल चलेगा और पूरे जीवन भर मिटृी चाटेगा।

लेकिन हम जानते है सर्प मिटृी नही खाता। परमेश्वर ने निश्चय ही यह कहा था कि वह मिटृी खाएगा।

परन्तु ऐसा क्यों है? उत्पति 3:19 कहता है और अपने माथे के पसीने की रोटी खाएगा और अंत मे मिटृी मे मिल जाएगा क्योंकि तू उसी मे से निकाला गया है। यहां पर मिटृी मनुष्य को संबोधित करती है। जो मिटृी से रचा गया हैं यह परमेश्वर की आज्ञा का आत्मिक अर्थ है कि शत्रु शैतान मनुष्य को खाएगा जो मिटृी से बना है।

यहां तक कि हम परमेश्वर की संतान है तो भी यदि हम पाप करते है तो शैतान हमारे ऊपर दुख और परिक्षाऐं लाता है। लूका 4:5-7 यह बताता है पूरे संसार पर अधिकर करने के सामथ्र्य शैतान को सौंपी गई हैं। इसलिए शैतान एक गर्जने वाले सिहं के समान इस मौकेे की इन्तजार मे रहता है कि वह किसे फाड़ खाऐं। और उन्हे पाप मे डाल कर हमेशा के लिए नाश की ओर ले जा सकें। दुष्ट यहां तक की विश्वासीयों को भी जहां तक हो सकें भरमाने की कोशिष करता है।

रोमियों 5:12 कहता है इसलिए जैसा एक मनुष्य द्वारा पाप जगत मे आया और पाप द्वारा मृत्यु आई और इस रीति से मृत्यु सब मनुष्यों मे फैल गई क्योंकि सब ने पाप किया।

आदम ने अनाज्ञाकारिता का पाप किया और आत्मिक नियम के अनुसार“ पाप की मजदूरी मृत्यु है “ मनुष्य की आत्मा पाप के कारण मर गई और उसने परमेश्वर को खो दिया। मनुष्य शैतान का दास बन गया और अब उसको अनंत मृत्यु की ओर जाना पड़ा और वह पमरेश्वर तक पहुॅचने मे असफल रहा। और आदम के पाप करने के कारण उसके सब वशंज पापी बन गये और उन्हे मृत्यु की ओर जाना पड़ा।

 

 

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