‘‘क्रूस का संदेश-5’’

परमेश्वर मनुष्य का रचयिता है।

‘‘तब यहोवा परमेश्वर ने आदम को भूमि की मिट्टी से रचा और उसके नथनों में जीवन का श्वास फूंका और आदम जीवित प्राणी बन गया।’’ उत्पत्ति 2:7

परमेश्वर का न तो कोर्इ आदि है और न ही कोर्इ अन्त है, उसका अपना अस्तित्व आदि से है, जो कि एक असीमित समय है जो मनुष्य की समझ से बाहर है। और फिर परमेश्वर ने अपने चुनने के समय पर सृष्टि और मानवजाति की रचना के लिए योजना बनार्इ। और उस योजना को पूरा करने के लिए उसने काफी लम्बे समय तक तैयारी की थी।

सबसे पहले परमेश्वर ने आत्मिक क्षेत्र में से शारीरिक क्षेत्र को अलग किया जिसमें उसने सृष्टि की सभी वस्तुओं और मनुष्यों की रचना करनी थी। इसके साथ ही परमेश्वर ने अपने आपको त्रिएकता में बाँटा, पिता परमेश्वर, पिता पुत्र, और पिता पवित्रआत्मा। और उस समय से आज तक परमेश्वर ‘त्रिएक’ रहा है और उसी छवि में जैसी हमारी है।

परमेश्वर ने आत्मिक प्राणियों की रचना आत्मिक क्षेत्र में की जैसे स्वर्गीय सेना, स्वर्गदूत और करूबों की रचना जबकि पृथ्वी को शारीरिक क्षेत्र में बनाया। अपनी इन सभी तैयारियों को कर लेने के बाद उसने सृष्टि में की सभी वस्तुओं को बनाया जैसे उंजियाला, अन्तर (आकाश), सूरज, चांद तारे सभी प्रकार की सब्जियां और जानवर, और सबसे अन्त में उसने मनुष्य को बनाया।

सो परमेश्वर ने मनुष्य को क्यों बनाया? सच्चे उद्देश्य और मनुष्य की महत्व को समझने के लिए जरूरी है कि हम परमेश्वर के मानव जाति की रचना के उद्धेश्य को जानें।

  1. मनुष्य की रचना परमेश्वर की पवित्र छवि में की गर्इ।

उत्पत्ति 2:7 में हम पाते है। ‘‘तब यहोवा परमेश्वर ने आदम को भूमि की मिटटी से रचा और उसके नथुनों में जीवन का श्वास फूंका और आदम जीवित प्राणी बन गया।’’ जबकि परमेश्वर ने सृष्टि के सभी अन्य वस्तुओं को केवल अपने वचन के द्वारा बनाया था। परन्तु जब उसने मनुष्य को बनाया तो उसने उसे भूमि की मिटटी से व्यक्तिगत रूप या अपने हाथ से बनाया। परमेश्वर ने मनुष्य को पाँच इन्द्रियां और छ: आंतो से लेकर शरीर के सभी अंगों को पूरी परिपूर्णता के साथ बनाया, जो कि परमेश्वर के जीवन का श्वास फूंकने के बाद एक जीवित प्राणी बन गया।

सो किसके अनुसार आदम को जो कि मानवजाति का पिता था बनाया गया होगा। जैसा कि हम उत्पत्ति 1:27 में पढ़ते हैं ‘‘और परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप में सृजा। अपने ही स्वरूप में परमेश्वर ने उसको सृजा। उसने नर और नारी करके उनकी सृष्टि की।’’

आदम और हव्वा परमेश्वर की पवित्र छवि में रचे गए। बाहरी रूप के साथ साथ मनुष्य का आत्मा परमेश्वर से आया है और परमेश्वर के आत्मा से मेल खाता है। इसलिए मनुष्य का सबसे महत्वपूर्ण भाग उसका आत्मा है। शरीर तो केवल आत्मा को रखता है। आदम का आत्मा परमेश्वर के समान भलार्इ, ज्योति और सत्य से भरा हुआ था।

आदम के भले और बूरे के ज्ञान के वृक्ष का फल खाने के बाद और इस प्रकार से परमेश्वर के विरूद्ध पाप करने के बाद उसके सभी वंशज पापों और बुरार्इ में लिप्त हो गए और उन्होंने परमेश्वर की छवि को खो दिया।

  1. वह कारण कि क्यों परमेश्वर ने मनुष्य जाति को रचा और उसे उपजाता है।

यदि हम इस सवाल का जवाब ढूंढना और इसे समझना चाहते हैं कि ‘‘हम यहां क्यों हैं? तो हमें इस प्रश्न का उत्तर देने के योग्य होने की जरूरत है कि क्यों परमेश्वर ने मनुष्यजाति को रचा और उसकी पैदावार कर रहा है। बाइबल में कर्इ दृष्टान्त भूमि जोतने और फसल काटने के बारे में दिए गए हैं।

मत्ती 13 में प्रभु यीशु मसीह ने मनुष्य के हृदय को चार प्रकार की भूमि के साथ सम्बन्ध दिखाया है। मत्ती 3 में ‘‘गेहूं और भूसी का दृष्टान्त’’ और मत्ति 13 में ‘‘जंगली बीज का दृष्टान्त’’ है। बाइबल आने वाले दण्ड (न्याय) के बारे में बताती है कि कैसे वे लोग जो गेहूं के समान है न्याय के दिन स्वर्ग में प्रवेश करेंगे और दूसरे जो भूसे के समान है नरक की आग में फेंक दिए जाएंगे।

इस प्रकार के दृष्टान्तों में जो हम बाइबल में पाते हैं परमेश्वर हमें मानवजाति की रचना के उपर और संसार के इतिहास पर अधिकार की अपनी योजना को बताता है कि वह वैसी ही है जैसे कि भूमि को जोतना-बोना और इसमें से फसल को काटना। ठीक जैसे किसान अपनी भूमि को फसल के लिए बोता है परमेश्वर आज हमें बो रहा है।

तब क्यों परमेश्वर ने आदम को रचा और आज हमें उपजा रहा है? ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर सच्ची संतान प्राप्त करना चाहता है जिनके साथ वह अपना प्रेम बांट सके। अपने अद्भुत सामथ्र्य और भयानक न्यायाधीश के समान सृष्टिकर्ता परमेश्वर के एक हाथ में अधिकार और सख्त धार्मिकता है जबकि दूसरे हाथ में मानवीय गुण जैसे प्रेम, करूणा, कृपा इत्यादी है। क्योंकि परमेश्वर मनुष्य के समान प्रसन्न, आनन्दित, दु:खी या शोकित हो सकता है। अकेला रहने के बजाय वो उन्हें चाहता जिनके साथ वह प्रेम बांट सके।

मानों कि घर पर एक रोबोट है और वह सब कुछ करता है जो आप उसे करने को कहते हैं। लेकिन आपका बच्चा जो कर्इ बार आपको समस्या देता है और जैसे जैसे वह बड़ा होने लगता है तब अंत में वह अपने माता पिता के लिए उनके अनुग्रह और पे्रम के लिए धन्यवादी होता है। और उनके साथ प्रेम को बांटता है। रोबोट और बच्चे के बीच में आप किसको अधिक कीमती मानेंगे? यह कोर्इ महत्व नहीं रखता कि रोबोट कितना भी आज्ञाकारी और इंसान जैसा क्यों न दिखाइ देने लगे तब भी उसकी तुलना आपके बच्चे के साथ नहीं की जा सकती। जिसके साथ आप अपना हृदय बांट सकते हैं। इसी प्रकार परमेश्वर ने भी मानवजाति को रचा है क्योंकि वो सच्ची संतान चाहता है जो उसकी आज्ञा मानेंगे और अपनी स्वतंत्र इच्छा में अपनी हृदय उसके साथ बाटेंगे।

  1. गेहूं और भूसी।

यह बात कोर्इ महत्व नहीं रखती कि किसान अपने खेत में कितनी मेहनत से काम किया है। कटनी के समय तो उसे गेहूं के साथ-2 भूसी को भी बटोरना पड़ता है। और क्योंकि भूसी खाने के योग्य नहीं होती और इसलिए उसे यदि गेहूं के साथ एक ही खलिहान में इकट्ठा रखा गया तो गेहूं को भी नुकसान पहुंचा सकती है। इसलिए उसे केवल या तो खाद के रूप में इस्तेमाल किया सकता है या जलाया जा सकता है।

इसी प्रकार से जब मानवजाति का अन्त होगा परमेश्वर गेहूं को भूसी से अलग करेगा। मत्ती 3:12 में लिखा है ‘‘उसका सूप उसके हाथ में है। वह अपना खलिहान पूर्णत: साफ करेगा, और अपना गेहूं भण्डार में इकट्ठा करेगा, परन्तु भूसि को उस आग में जलाएगा जो बुझने की नहीं’’।

यहां पर ‘‘न बुझने वाली आग’’ का अर्थ नरक की आग से है। युग के अन्तिम दिनों जब परमेश्वर चाहेगा वो मानवजाति की पैदावार को समाप्त करेगा और न्याय करेगा। प्रत्यक मनुष्य को जो इस संसार में कभी रहा है उसको न्याय के समय में वे जो गेहूं के समान न होकर केवल भूसी के समान हैं उन्हें नरक की आग में डाल दिया जाएगा।

‘‘गेहूं’’ यहां पर उन लोगों को दर्शाता है जिन्होंने प्रभु यीशु मसीह को ग्रहण किया और परमेश्वर के प्रेम में वचन के अनुसार रहे जिये। उन्होंने मेहनत के साथ पापों  और बुरार्इ को उतार फेंका और दोबारा से उसकी पवित्र छवि को प्राप्त कर लिया। इसके विपरित ‘‘भूसी’’ उन लोगों को दर्शाती है जो परमेश्वर में विश्वास नहीं रखते और यीशु मसीह को अपना उद्धारकर्ता ग्रहण नहीं करते।

यहां पर एक बात ध्यान में रखने योग्य है कि प्रत्येक जो कलीसिया में उपस्थित होता है वह ‘‘गेहूं’’ नहीं है। यदि वह परमेश्वर के वचन को संसारिक अभिलाषाओं के कारण त्याग देता है वजाए इसके कि वचन के अनुसार चले वो परमेश्वर की दृष्टि में ‘‘भूसी’’ समान है। इसीलिए यीशु मसीह ने मत्ती 7:21 में कहा है ‘‘प्रत्येक जो मुझ से, ‘‘हे प्रभु! हे प्रभु! कहता है, स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है, वही प्रवेश करेगा।

परमेश्वर की इच्छा है कि सब मनुष्य के लिए यह है कि वे ‘‘गेहूं’’ बने और उद्धार को प्राप्त करें (2 तीमुथियुस 2:4) इसी कारण से उसने अपना एकलौता पुत्र हमारे लिए क्रूस पर मरने के लिए दे दिया। इस सब के बावजूद भी जो लोग यीशु मसीह को उद्धारकर्ता ग्रहण किए बिना पाप में जी रहे हैं वे अपने सच्चे महत्व को पहचानने योग्य नहीं हो पाएंगे जिनकी रचना परमेश्वर की छवि में की गर्इ है। इसलिए वे केवल भूसी हैं।

‘‘भूसी’’ जिन्होंने ने अपनी महत्व को खो दिया है वे उसी स्वर्ग में इकट्ठा नहीं किए जा सकते जिसमें गेहूं है। यदि लोग र्इष्र्या, जलन, लालच और दूसरी बुरार्इयों से भरे हुए हैं यदि उन्हें स्वर्ग में आने दिया तो स्वर्ग भी भ्रष्ट हो जाएगा।

उन लोगों का क्या होगा जो स्वर्ग में प्रवेश नहीं कर पाएंगे? क्योंकि प्रत्येक मनुष्य जो आत्मा अनश्वर वो विलुप्त नहीं हो सकती। उन्हें हमेशा-हमेशा के लिए नरक में एक छोटे से स्थान में इकट्ठा किया जाएगा और उनके पापों की मजदूरी के अनुसार वे नरक की न बुझने वाली आग में अनन्त काल की सजा प्राप्त करेंगी। (अधिक जानकारी के लिए डा. जैरॉक ली द्वारा लिखित पुस्तक ‘‘नर्क’’ (Hell) का अध्ययन करें।

मसीह में प्यारे भार्इयों और बहनों,

मैं हमारे प्रभु यीशु के नाम में प्रार्थना करता हूं काश मानवीय पैदावार में से आप में से प्रत्येक जन परमेश्वर की सच्ची सन्तान बन जाएं और पिता के पीछे चलते हुए, पवित्र हृदय रखते हुए और उसे प्रेम करते हुए अनन्त काल के लिए सुन्दर और महिमा युक्त स्वर्ग में वास करें। आमीन

 

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